Thursday, October 22, 2020

जीवन

      (पोस्टर में उपयोग किया गया चित्र गूगल से साभार)


बीज जितना ही निर्दोष था मैं
फोड़कर उग सकने योग्य भूमि हेतु
भटकना था मुझे इस प्रांत से उस प्रांत

पत्तियों जितना ही औदार्य था मुझमें
जीवन को उसकी अंतिम बूँद तक सोख
रेशा रेशा हो जाना था माटी में आखिरकार

काँटों जितना ही उपेक्षित भी था मैं
फूल जैसे लोगों के बीच रहा निष्प्रयोजन
बच बचा कर मुझसे निकले तमाम भले लोग ।

- नील कमल 

Tuesday, October 15, 2019

दहाड़

दहाड़ते हैं आप
और एक परिंदा भी नहीं उड़ता 

मांस का टुकड़ा उछालता है कोई
आप सोचते हैं आपने किया शिकार

एक बहुत बड़े बाड़े में आप रहते हैं आजकल
किसी ने बताया नहीं आपको, आप सर्कस में हैं,
आपका एक रिंग मास्टर है, आपसे भी शक्तिशाली ।
- नील कमल 

Monday, October 14, 2019

रज़ा

श्राद्धभोज के पश्चात
महापात्र लौट रहे थे इन्द्रप्रस्थ से
जयध्वनि गुंजाते, अपने सीने फुलाते

इन्द्रप्रस्थ में उन दिनों अमात्य का प्रताप था
राजा मर चुका था छोड़ कर अथाह सम्पत्ति
अंतिम इच्छा थी उसकी महापात्रों को बुलाया जाए
दया दाक्षिण्य में किसी प्रकार कार्पण्य न होने पाए

अमात्य था राजा का विश्वासपात्र, ऊपर से कवि था वह
श्राद्धभोज को इस प्रकार नाम दिया गया उत्सव का तब

कास के निविड़ वन खिल उठते जब धवल पुष्पों से
अमात्य का बुलावा आता महापात्रों को इन्द्रप्रस्थ से
विलासबहुल प्रासाद में प्रवास का दुर्दमनीय आमंत्रण

आमोद प्रमोद में काट कर उत्सव के दिन
लौट रहे होते प्रसन्नवदन मुदितमन महापात्र जब
राजधानी से कोसों दूर किसी वनप्रान्तर में कृषक
हताशा में तैयार कर रहे होते गले के लिये फन्दा
जवान लोग तब सड़कों पर खा रहे होते लाठियाँ
औरतें छुपने की जगह खोजतीं अँधेरी कोठरियों में
मध्याह्नभोज के बाद बीमार पड़ जाते अबोध शिशु

किन्तु महापात्रों को इन सबसे क्या
वे तो उत्सव के सजीले मंच से सुनाते सुंदर काव्य
और लौटकर अपने अपने गृहजनपद की सीमा में
छोड़ते हुए लम्बी डकार, कहते अमात्य की जय हो,
व्यवस्था यह चलती रहे, इसी में हम सबकी रज़ा है !

- नील कमल

Tuesday, October 1, 2019

पहली करुणा पहली चोट

पहले प्रेम को नहीं
पहले घात को याद करता हूँ

पहले कवि को नहीं
पहली करुणा को याद करता हूँ

पहली दवा से पहले
याद करता हूँ पहली चोट को

पहली सड़क जो जाती थी
घर से बाहर उसे याद करूँ
इससे पहले याद आती है पहली ठोकर

पहले-पहल की हर याद से पहले
मुझे वह घाव याद आता है, दो हड्डियों
के संधिस्थल पर टीसता हुआ अविराम ।

- नील कमल

Monday, September 16, 2019

कृष्णचूड़ा राधाचूड़ा

ये जो लाल लाल फूल हैं
हरे के बीच खिले चटक
इन्हें क्या कहती हो तुम ?

अरे ! यह भी नहीं जानते ?
इन्हें कृष्णचूड़ा कहते हैं, ठीक है ?

अच्छा, ये जो पीले पीले फूल हैं उधर
गुच्छों में, शायद पहचानता हूँ मैं इन्हें,
सच सच कहो, ये अमलतास ही हैं न ?

कुछ भी नहीं पहचानते तुम ठीक ठाक
देखो, ये राधाचूड़ा के फूल हैं, ठीक है ?

ठीक है, ठीक है लड़की,
आती है एक ऋतु जिसमें
फूलों के नाम याद नहीं रहते
इन्हीं ऋतुओं में ठीक ठीक पहचाने जाते हैं फूल ।

- नील कमल

Sunday, June 23, 2019

नामखाना लोकल

इंजन से चौथे डिब्बे में
मेरी बगल में बैठा
यह अधेड़ उम्र हॉकर
टोकरी के फल सारे बेच कर
इतना निश्चिंत कि जल्द ही
शिथिल देह झपकी लेता
रखता है सिर मेरे बायें कंधे पर

थकान से बेसुध उसे कहाँ मालूम
उसके पसीने से भींग रहा मेरा कंधा

'फटाश जल' की बोतलें खुलती हैं
तो मुझे याद आती है अपनी प्यास

चाहता हूँ कि टोक दूँ उसे, कहूँ
सीधे होकर क्यों नहीं बैठते भाई,
लेकिन चुप रहता हूँ, सोचता हूँ
कितने बड़भागी होते हैं कंधे जिनपर
टेक लेकर निश्चिंत सो सकता है मनुष्य

दुःख यह कि चार स्टेशन बाद ही
उतरना होगा अपने भींगे कंधों के साथ ।

(फटाश जल : सियालदह साउथ सेक्शन का एक लोकप्रिय पेय; सस्ते मूल्य वाला बोतलबंद कार्बोनेटेड वाटर ।)

- नील कमल

Thursday, June 13, 2019

पुरुलिया

फुदकती हुई मैना
आ धमकती है बीच सड़क
और ढीला पड़ने लगता है
पाँव का दबाव एक्सीलेरेटर पर

बकरियाँ दलबद्ध
पार करती हैं पिच वाली सड़क
टुनटुन बजती हैं गले की घंटियाँ
भूले से भी नहीं बजाता हॉर्न टूरिस्ट गाड़ी का ड्राइवर

बिना भय के मोर
बच्चों के झुण्ड के साथ पार करता है सड़क
कहीं कोई नहीं होता हैरान इसअद्भुत दृश्य पर

सभ्यता के नक्शे पर एक पिछड़ा इलाका है यह
मनुष्यता की देह यहाँ गीली है पसीने के नमक से

पृथ्वी के सकुचाये मुख पर
मल दिया है किसी ने रक्तपलाश का रंग

पहाड़ की दो चोटियों के फाँक से
सोने की गेंद सा उछल आया है दोल पूर्णिमा का चाँद ।

- नील कमल