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Tuesday, May 16, 2023

चार कविताएँ


(१) अमलतास 

गुलमोहर ने

कुहनी गड़ा दी

अमलतास की कमर में,

और पलट कर

थपकी दी अमलतास ने

गुलमोहर की पीठ पर |

ठीक उसी वक्त

खिल उठा कनेर का चेहरा,

पीपल के होठों पर

उतर आई अजीब सी एक चमक,

एक बच्चा कटहल

हरी काँटेदार त्वचा वाला

उमग कर चिपका रहा

अधेड़ पिता के कंधे से

और उसके भीतर सोये

कोये गुदगुदी महसूस करते रहे

गुलमोहर की शरारत पर |

गुलमोहर और अमलतास

हँसते रहे, जैसे

बेखयाली में हँस-हँस कर

दोहरी हुई जाती हों

दो अल्हड़ सहेलियाँ |

वहीं कहीं

पराजित हो दुबका रहा

हिन्दी का एक किताबी मुहावरा

लाल-पीला होता रहा समय का चेहरा

गुस्से से नहीं, प्रेम से तृप्त और अघाया हुआ |

(२) श्रावण

आषाढ़-पिता की गोद से

अभी-अभी उतरा है श्रावण-शिशु |

पृथ्वी का सारा दुःख

पृथ्वी का सारा संताप

धुल गया है बारिश में |

फूलों में रंग है पहले से ज्यादा

पत्तियों में चमक रोज से ज्यादा |

नहा कर खिल उठी है पृथ्वी की देह,

मातृत्व के दर्प में चमकती हुई आदिम स्त्री देह |

(३) दुविधा – एक

उस वक्त

जबकि मेरी कनपटी पर

सटी थी आततायी की बंदूक

ईश्वर को नींद आ गई थी |

ईश्वर की शपथ लेकर

जिन्होंने जताई थी आस्था

दुनिया की सबसे मोटी किताब में

उनके लिए, उस वक्त

संविधान, कबाड़ी वाले के यहाँ

पड़ी किसी किताब से अधिक नहीं था |

तय मुझे करना था,

मारा जाऊँ, एक किताब में

लिखे शब्दों को बचाते हुए

या दोनों हाथ ऊपर कर दूँ |

(४) दुविधा – दो

सच बोलूँगा और मारा जाऊँगा

बोलूँगा झूठ तो थोड़ी देर और

रह जाऊँगा ज़िंदा |

चुप रहूँगा तो शायद

बचा रहूँ कुछ और दिन |

मेरे भीतर छुप कर बैठा

मिडिल क्लास आदमी

चाहता है साध लूँ चुप्पी

और निहायत ही मुश्किल लगे

अगर चुप रहना, तो बोल दूँ झूठ

और बच निकलूँ फिलहाल |

मेरे भीतर तभी सिर उठा कर

खड़ा होता है एक कवि

मेरा कवि मुझे सच कहने को तत्पर करता है |

_________________
अनहद -6 (संपादक : संतोष चतुर्वेदी), इलाहबाद , में प्रकाशित

Thursday, January 26, 2023

आँधियाँ जिस तरह जानती हैं अरण्य को: प्रेमेन्द्र मित्र

आँधियाँ जिस तरह जानती हैं अरण्य को

                      तुमको उसी तरह जानता हूँ मैं,

तेज नदी की धारा को जिस तरह देखता है

                        आसमान का तारा

                        -वैसा ही मेरा देखना।

                         ठहरता नहीं हूँ मैं

मेरे लिए नहीं है आराम का कोई मतलब।


अपनी बेचैनी को मैं कैसे समझाऊँ!

बाती से खुलता है कहीं बिजली का अर्थ?

         सागर का अर्थ दे पाता है सरोवर?

एक अर्थ होता है पालतू पशु की आँखों में

 और ही एक अर्थ जंगली साँप के सीने में;


व्यर्थ है दोनों के बीच का मिलान

अपनी उद्दामता में ही मिलूँगा मैं;

छोड़ दो मुझे वश कर पाने का ख्याल;

              सहज कर पाने का ख्याल।


कौन जानता है मेरा जानना ही हो शायद

                         सचमुच का जानना।

डोल न उठे जबतक आसमान का भी शायद

                    तबतक नहीं कोई अर्थ,

पृथ्वी को भी डोलकर होना होता है सत्य 


तुम हो मेरा आसमान

-मेरे तेज बहाव में ही डोलती 

               तुम्हारी पहचान!


तुम ही मेरा अरण्य!


तुम ही मेरे झंझावातों का 

          ठौर और प्रतिबिम्ब।

[बांग्ला कविता: झड़ जेमोन कोरे जाने अरण्य के] 

कवि: प्रेमेन्द्र मित्र 

मूल बांग्ला से हिंदी अनुवाद: नील कमल 

Sunday, August 8, 2021

बनलता सेन व अन्य कविताएँ - जीवनानन्द दाश


★ बनलता सेन / जीवनानन्द दाश 

हजार वर्षों से मैं राह चलता रहा हूँ पृथ्वी की राह पर
सिंहल समुद्र से बहुत दूर मालय सागर के अँधियारे में
काफी चला हूँ मैं, बिम्बिसार अशोक की धूसर दुनिया में
रहा आया हूँ मैं वहाँ, और दूर विदर्भ नगरी के अँधियारे में
थकी एक रूह मैं, चारों ओर जीवन के समुद्र का फेन
मुझे ज़रा सा चैन देती थी, नाटोर की बनलता सेन ।


ज़ुल्फ़ें उसकी जाने कबकी विदिशा की अँधियारी रैन
चेहरा उसका श्रावस्ती का शिल्प, बहुत दूर सागर में
दिशा भूल वह नाविक जिसकी टूट गई पतवार
देखता हरी घास का देश आँख से दारचीनी द्वीप के अंदर
वैसे ही देखा उसको अँधियारे, पूछा उसने नैन उठाकर, 'कहाँ रहे इतने दिन'
परिंदे के बसेरे जैसी आँखों वाली वह बनलता सेन ।

समूचे दिन के आख़िर में, शबनम की आवाज़ सी
उतर आती है शाम, डैनों से धूप की गंध पोंछ डालती है चील
रंग सारे पृथ्वी के मिट जाने पर, क़लमी नुस्खा होता तैयार
किस्सों की ओट में, जुगनुओं की झिलमिल रोशनी में,
सारे परिंदे घर लौटते हैं - सारी नदियाँ, ख़त्म होता है इस जीवन का लेनदेन
रह जाता सिर्फ़ अँधियारा, रूबरू बैठने को बनलता सेन । 

मूल बांग्ला से अनुवाद: नील कमल 
                         (चित्र गूगल से साभार)

★ घास / जीवनानन्द दाश

नन्हे नींबू-पत्ते सी नर्म हरी रोशनी से
भर उठी है यह पृथ्वी इस भोर वेला में ।

कच्चे बाताबी सी हरी घास- वैसी ही ख़ुशबूदार-
हिरण दाँतों से नोंच लेते हैं ।

मेरा भी मन करता है इस घास की महक हरित मद्य सा
पीता रहूँ गिलास पर गिलास ।

सान दूँ इस घास के शरीर को- आँखों पर घसूँ आँखें,
घास के भीतर घास बन जन्म लूँ, निविड़ किसी घास-माँ की
देह के स्वाद भरे अंधकार से निकलकर ।

(बाताबी= नींबू की प्रजाति के एक फल का बांग्ला नाम, हिंदी में चकोतरा)
मूल बांग्ला से अनुवाद: नील कमल 

Wednesday, January 13, 2021

उम्मीद न करें जनाब



इतना साधु कभी हो नहीं पाया
कि हत्यारे से कहूँ जाओ माफ़ किया

दुःख के पोखर में जिसने डुबोया
दुःख की नदी में डूबकर मरे यही चाहा

मुट्ठीभर फल खाने वालों के लिए
कोटि कोटि जन को कर्म की नसीहत करने वाले
धर्मग्रंथ को क्यों न फूँक कर ताप लूँ इसी जाड़े में

पिद्दी सी प्रजा हूँ तो क्या
जिस राजा ने नरक बनाया जीवन जन जन का
सरापता हूँ मर जाये जैसे ही करे अगला अन्याय

बेईमान न्यायाधीश लिखने को हो
जब कोई फैसला वंचित जन के हक़ के ख़िलाफ
कोढ़ फूटे उसकी अँगुलियों में और कलम छूट जाए

कवि से उम्मीद न करें जनाब
कि करेगा वह हुस्न और इश्क़ की बातें ऐसे वक़्त
तिलमिलाहट से न भर दे कागज पर छपी कविता
उसे कुत्ते की पूँछ में बाँध दीजिए ।

- नील कमल 

Saturday, January 2, 2021

अवनी क्या घर पर हो - शक्ति चट्टोपाध्याय



सोया पड़ा मुहल्ला सारा भींचके सब दरवाजे
खटखट करती रात सुनूँ मैं केवल साँकल बाजे
अवनी, क्या घर पर हो ?

बारिश का पानी गिरता है यहॉं बारहों मास
बादल फिरते जैसे कोई गाय विचरती जाय
द्वार छेंककर खड़ी
विमुख वह लंबी हरियल घास
अवनी, क्या घर पर हो ?

अर्धलीन गहरी पीड़ा में डूबा
जब सो जाता, रात बजाती साँकल
तब सहसा मैं सुन पाता
अवनी, क्या घर पर हो ?

मूल कविता : शक्ति चट्टोपाध्याय
बांग्ला से हिंदी भाषांतर : नील कमल 

Friday, January 1, 2021

अमलकांति - नीरेंद्रनाथ चक्रवर्ती



अमलकांति मेरा दोस्त
स्कूल में हम एकसाथ पढ़ते ।
रोज देर से क्लास में आता, जवाब कुछ बता नहीं पाता,
शब्दरूप पूछने पर अवाक यूँ खिड़की की तरफ देखता,
कि देखकर उसे हम सबको बड़ा कष्ट होता ।

हममें से कोई मास्टर बनना चाहता था, कोई डॉक्टर, कोई वकील ।
अमलकांति ऐसा कुछ भी नहीं चाहता था बनना।
वह धूप बनना चाहता था !
बारिश के बाद की उतरती शाम वाली शर्मीली धूप
जामुन और जामरुल की पत्तियों पर जो जरा सी मुस्कान की तरह खिली रहती है ।

हममें से कोई मास्टर बना, कोई डॉक्टर, कोई वकील ।
अमलकांति धूप न बन सका ।
वह अब अँधेरे एक छापाखाने में काम करता है ।
कभी कभी मुझसे मिलने आता है ; चाय पीता है,
इधर उधर की बातें करता है, फिर कहता है, अच्छा तो फिर चलता हूँ ।
मैं उसे दरवाजे तक छोड़ आता हूँ ।

हममें से जो इन दिनों करता है मास्टरी
वह अनायास ही डॉक्टर बन सकता था,
जो चाहता था डॉक्टर बनना, यदि वकील भी बनता
तो इसमें वैसा घाटा कुछ नहीं था ।

आखिर सबकी इच्छाएँ हुईं पूरी
एक अमलकांति को छोड़कर ।
अमलकांति धूप न बन सका ।
वही अमलकांति, धूप के बारे में सोचते सोचते,
सोचते सोचते,
जो एकदिन धूप बन जाना चाहता था । 

मूल कविता : नीरेंद्रनाथ चक्रवर्ती
बांग्ला से अनुवाद : नील कमल 

Thursday, December 24, 2020

अभिधा में


सर्वनाम से अधिक
संज्ञायें मेरे काम आईं

विशेषणों से अधिक
क्रियाओं से काम लिया मैंने


तत्सम के इलाके में
तद्भव जितना ही मिसफिट रहा

जब व्यंजना और लक्षणा में
बना रहे थे कविताएँ मेरे दौर के कवि
मैंने अभिधा में कहनी चाही अपनी बात । 

- नील कमल 

Thursday, October 22, 2020

जीवन

      (पोस्टर में उपयोग किया गया चित्र गूगल से साभार)


बीज जितना ही निर्दोष था मैं
फोड़कर उग सकने योग्य भूमि हेतु
भटकना था मुझे इस प्रांत से उस प्रांत

पत्तियों जितना ही औदार्य था मुझमें
जीवन को उसकी अंतिम बूँद तक सोख
रेशा रेशा हो जाना था माटी में आखिरकार

काँटों जितना ही उपेक्षित भी था मैं
फूल जैसे लोगों के बीच रहा निष्प्रयोजन
बच बचा कर मुझसे निकले तमाम भले लोग ।

- नील कमल 

Tuesday, October 15, 2019

दहाड़

दहाड़ते हैं आप
और एक परिंदा भी नहीं उड़ता 

मांस का टुकड़ा उछालता है कोई
आप सोचते हैं आपने किया शिकार

एक बहुत बड़े बाड़े में आप रहते हैं आजकल
किसी ने बताया नहीं आपको, आप सर्कस में हैं,
आपका एक रिंग मास्टर है, आपसे भी शक्तिशाली ।
- नील कमल 

Monday, October 14, 2019

रज़ा

श्राद्धभोज के पश्चात
महापात्र लौट रहे थे इन्द्रप्रस्थ से
जयध्वनि गुंजाते, अपने सीने फुलाते

इन्द्रप्रस्थ में उन दिनों अमात्य का प्रताप था
राजा मर चुका था छोड़ कर अथाह सम्पत्ति
अंतिम इच्छा थी उसकी महापात्रों को बुलाया जाए
दया दाक्षिण्य में किसी प्रकार कार्पण्य न होने पाए

अमात्य था राजा का विश्वासपात्र, ऊपर से कवि था वह
श्राद्धभोज को इस प्रकार नाम दिया गया उत्सव का तब

कास के निविड़ वन खिल उठते जब धवल पुष्पों से
अमात्य का बुलावा आता महापात्रों को इन्द्रप्रस्थ से
विलासबहुल प्रासाद में प्रवास का दुर्दमनीय आमंत्रण

आमोद प्रमोद में काट कर उत्सव के दिन
लौट रहे होते प्रसन्नवदन मुदितमन महापात्र जब
राजधानी से कोसों दूर किसी वनप्रान्तर में कृषक
हताशा में तैयार कर रहे होते गले के लिये फन्दा
जवान लोग तब सड़कों पर खा रहे होते लाठियाँ
औरतें छुपने की जगह खोजतीं अँधेरी कोठरियों में
मध्याह्नभोज के बाद बीमार पड़ जाते अबोध शिशु

किन्तु महापात्रों को इन सबसे क्या
वे तो उत्सव के सजीले मंच से सुनाते सुंदर काव्य
और लौटकर अपने अपने गृहजनपद की सीमा में
छोड़ते हुए लम्बी डकार, कहते अमात्य की जय हो,
व्यवस्था यह चलती रहे, इसी में हम सबकी रज़ा है !

- नील कमल

Tuesday, October 1, 2019

पहली करुणा पहली चोट

पहले प्रेम को नहीं
पहले घात को याद करता हूँ

पहले कवि को नहीं
पहली करुणा को याद करता हूँ

पहली दवा से पहले
याद करता हूँ पहली चोट को

पहली सड़क जो जाती थी
घर से बाहर उसे याद करूँ
इससे पहले याद आती है पहली ठोकर

पहले-पहल की हर याद से पहले
मुझे वह घाव याद आता है, दो हड्डियों
के संधिस्थल पर टीसता हुआ अविराम ।

- नील कमल

Monday, September 16, 2019

कृष्णचूड़ा राधाचूड़ा

ये जो लाल लाल फूल हैं
हरे के बीच खिले चटक
इन्हें क्या कहती हो तुम ?

अरे ! यह भी नहीं जानते ?
इन्हें कृष्णचूड़ा कहते हैं, ठीक है ?

अच्छा, ये जो पीले पीले फूल हैं उधर
गुच्छों में, शायद पहचानता हूँ मैं इन्हें,
सच सच कहो, ये अमलतास ही हैं न ?

कुछ भी नहीं पहचानते तुम ठीक ठाक
देखो, ये राधाचूड़ा के फूल हैं, ठीक है ?

ठीक है, ठीक है लड़की,
आती है एक ऋतु जिसमें
फूलों के नाम याद नहीं रहते
इन्हीं ऋतुओं में ठीक ठीक पहचाने जाते हैं फूल ।

- नील कमल

Sunday, June 23, 2019

नामखाना लोकल

इंजन से चौथे डिब्बे में
मेरी बगल में बैठा
यह अधेड़ उम्र हॉकर
टोकरी के फल सारे बेच कर
इतना निश्चिंत कि जल्द ही
शिथिल देह झपकी लेता
रखता है सिर मेरे बायें कंधे पर

थकान से बेसुध उसे कहाँ मालूम
उसके पसीने से भींग रहा मेरा कंधा

'फटाश जल' की बोतलें खुलती हैं
तो मुझे याद आती है अपनी प्यास

चाहता हूँ कि टोक दूँ उसे, कहूँ
सीधे होकर क्यों नहीं बैठते भाई,
लेकिन चुप रहता हूँ, सोचता हूँ
कितने बड़भागी होते हैं कंधे जिनपर
टेक लेकर निश्चिंत सो सकता है मनुष्य

दुःख यह कि चार स्टेशन बाद ही
उतरना होगा अपने भींगे कंधों के साथ ।

(फटाश जल : सियालदह साउथ सेक्शन का एक लोकप्रिय पेय; सस्ते मूल्य वाला बोतलबंद कार्बोनेटेड वाटर ।)

- नील कमल

Thursday, June 13, 2019

पुरुलिया

फुदकती हुई मैना
आ धमकती है बीच सड़क
और ढीला पड़ने लगता है
पाँव का दबाव एक्सीलेरेटर पर

बकरियाँ दलबद्ध
पार करती हैं पिच वाली सड़क
टुनटुन बजती हैं गले की घंटियाँ
भूले से भी नहीं बजाता हॉर्न टूरिस्ट गाड़ी का ड्राइवर

बिना भय के मोर
बच्चों के झुण्ड के साथ पार करता है सड़क
कहीं कोई नहीं होता हैरान इसअद्भुत दृश्य पर

सभ्यता के नक्शे पर एक पिछड़ा इलाका है यह
मनुष्यता की देह यहाँ गीली है पसीने के नमक से

पृथ्वी के सकुचाये मुख पर
मल दिया है किसी ने रक्तपलाश का रंग

पहाड़ की दो चोटियों के फाँक से
सोने की गेंद सा उछल आया है दोल पूर्णिमा का चाँद ।

- नील कमल

Friday, June 7, 2019

वे आ रहे हैं

पूरब से आई आवाज़, वे आ रहे हैं
पश्चिम से गूँजा नारा, हाँ वे आ रहे हैं
उत्तर-दक्षिण में उनके आने की घोषणाएँ थीं

मुँह उठाये वे आते थे
वे आते थे और सीधे मंचों पर चढ़ जाते थे
मंचों पर चढ़ कर वे कविताओं का पाठ करते थे

जितनी देर वे पाठ करते अपनी कविताएँ
उतनी देर के लिये सोने चले जाते थे हत्यारे
उतनी देर के लिये फूल ही फूल खिल जाते थे

वे प्रेम कविताओं के कवि थे
और हर हाल में बचा लेना चाहते थे प्रेम
प्रेम को बचाने के लिये वे कविताएँ लिखते थे

वे इस कदर डूबे थे प्रेम में
कि फ्रेम के बाहर नहीं देखते थे नज़र उठा कर
फ्रेम के बाहर की दुनिया उनकी दुनिया नहीं थी

वे दर्शनीय कवि थे
वे प्रदर्शनीय कवि थे
किंतु सदा संशय रहता उन्हें अपने विश्वसनीय होने पर ।

- नील कमल

Wednesday, May 8, 2019

कैमेलिया / रवींद्रनाथ ठाकुर

कमला नाम है उसका
देखता हूँ लिखा उसकी नोटबुक पर
वह जाती थी ट्राम में, भाई के साथ कॉलेज के रास्ते
मैं बैठा ठीक पिछ्ली बेंच पर
चेहरे की सुघड़ रेखा इस तरफ से देती दिखाई
और गर्दन पर रोंये कोमल जूड़े के ठीक नीचे
गोद में उसकी किताबें और नोटबुक,
जहाँ उतरना था मुझे वहाँ उतरना न हुआ मेरा ।

अब वक़्त का हिसाब करके निकलता हूँ बाहर
हिसाब वक़्त का मेरे काम से मेल खाता है ऐसा नहीं
अक्सर मेल खाता है वक़्त उनके बाहर निकलने से
अक्सर ही देखता हूँ उन्हें
सोचता मन ही मन, कोई और रिश्ता न सही
वह मेरी सहयात्रिणी तो है ।
निर्मल बुद्धि चेहरा उसका झिलमिल करता हो जैसे
सुकुमार मस्तक से ऊपर को सँवारे गए उसके केश
उज्वल आँखों की निस्संकोच दृष्टि ।

सोचता हूँ मन में, कोई संकट ही आ क्यों नहीं जाता
उद्धार कर सार्थक कर लूँ यह जन्म
रास्ते में कहीं कोई उत्पात
या किसी गुण्डे की स्पर्धा
ऐसा तो होता ही है आजकल
लेकिन भाग्य मेरा मटमैले पानी वाला गड्ढा
बड़ा कोई इतिहास उसमें समाता नहीं
दिन बेचारे मेंढक की तरह एकरस पुकारते
नहीं जिसमें मगरमच्छों घड़ियालों का निमंत्रण
और न ही निमंत्रण किसी राजहंस का ।

एकदिन थी रेलपेल वाली भीड़ ट्राम में
कमला के बगल में बैठा कोई आधा-अंग्रेज,
जी किया, अकारण ही टोपी उछाल दूँ उसके सिर से,
पकड़ के उसकी गर्दन उतारूँ उसे रास्ते पर,
कोई बहाना नहीं मिलता
हाथ कसमसाते रहे मेरे
कि तभी एक मोटा चुरुट सुलगा कर कश लगाया उसने

पास उसके आकर कहा मैंने - 'फेंको यह चुरुट' !
मानो सुना ही नहीं उसने
धुँए के छल्ले उड़ाने लगा वह
मुँह से उसके खींच कर चुरुट मैंने फेंक दिया सड़क पर
वह ताकता रहा गुस्से में मुट्ठियाँ अपनी कसते हुए
लेकिन कहते कुछ न बना उससे
एक छलाँग में कूद कर उतर गया वह ट्राम से
शायद वह पहचानता है मुझे
फुटबॉल के खेल में आखिर नाम है मेरा
और नाम खूब अच्छाखासा है ।

लाल हो उठा मुख उसका
खोल कर किताब पढ़ने का अभिनय वह करती रही
कटाक्ष भर भी नहीं देखा इस वीरपुरुष की ओर
ऑफिस जाते बाबुओं ने कहा - 'बहुत सही किया श्रीमान' !
थोड़ी ही देर बाद वह उतर गई गंतव्य से पहले ही
टैक्सी लेकर वह चली गई ।

अगले दिन नहीं दिखी वह
और उसके अगले दिन भी नहीं
तीसरे दिन देखा उसे
ठेलागाड़ी में जाती थी कॉलेज
समझा, कि गलती की मैंने गँवारों की तरह,
अपनी जिम्मेदारी वह खुद उठा सकती है
मेरी कोई जरूरत वहाँ थी ही नहीं
फिर दोहराया मैंने, 'भाग्य मेरा
मटमैले पानी वाला गड्ढा'
बहादुरी की स्मृति आज केवल
मेंढक की टर्राहट सी बजती है मन में
तय किया मैंने, यह गलती सुधारनी ही होगी ।

खबर आई है, वे लोग दार्जीलिंग आते हैं गर्मियों में
इस बार हवा बदलने की जरूरत मुझे भी महसूस हुई
छोटा सा उनका घर - नाम जिसका मोतिया
रास्ते से उतर कर थोड़ा नीचे की ओर कोने में
पेड़ के झुरमुट में, सामने जिसके बर्फीले पहाड़ ।
सुना, इस बार नहीं आ रहे वे
लौट चलूँ सोचता हूँ कि तभी मिल गये एक भक्त
मोहनलाल -
दुबला शरीर, लम्बा कद, आँख पर चश्मा
कमजोर पेट को दार्जीलिंग की हवा रास आती है
बोले, 'तनुका, मेरी बहन,
नहीं छोड़ेगी मुझे जबतक आपसे न मिलवा दूँ उसे'
बिलकुल छाया सी थी वह
देह इतनी हल्की कि जितने के बिना होना संभव नहीं
फुटबॉल के इस सरदार के प्रति अद्भुत उसकी यह भक्ति
सोचती है वह, मिलने जाना मेरा उसके प्रति दुर्लभ दया,
हाय रे भाग्य का यह खेल !

जिस दिन उतर आऊँगा नीचे, उससे दो दिन पहले
बोली तनुका, 'एक चीज दूँगी आपको जिससे
आपको आती रहेगी हम सबकी याद,
वह एक फूल वाला पौधा' ।
यह कैसा उत्पात, चुप ही रहा मैं सुनकर
तनुका बोली, 'दुर्लभ और कीमती है यह पौधा,
इस देश की माटी में मुश्किल से बच पाता है'
पूछा मैंने, 'नाम क्या है इसका ?'
उसने कहा, ' कैमेलिया' ।
हैरत हुई, और एक नाम तभी कौंध गया मन के अँधेरे में
हँसकर मैंने कहा, 'कैमेलिया,
सहज ही मेल नहीं खाता इसका मन शायद'
तनुका ने जाने क्या समझा, हठात शरमा गयी वह
लेकिन खुश भी दिखी ।

गमले में पौधा लिये चला मैं
देखा, बगल में बैठी सहयात्रिणी असहज थी,
दो डिब्बों वाली गाड़ी में
छुपाया मैंने गमले को निचले डिब्बे में ।
खैर, छोड़िये यह भ्रमण वृत्तांत
जाने दीजिये महीनों की तुच्छता को ।

पूजा की छुट्टियों में उठा परदा
संथाल परगना में,
छोटी सी वह जगह, नाम नहीं बताऊँगा
हवा बदल के लिये घूमने वाले इस जगह के बारे में नहीं जानते ।
कमला के मामा थे इंजीनियर,
यहीं घरबार था जिनका
शालवन की छाया में
गिलहरियों के इस मुहल्ले में
जहाँ दिगंत में दिखते नीले पहाड़
पास ही रेत के बीच बहती जल की धार
पलाशवन में जहाँ तसर की गोटियाँ
भैंसें जहाँ चरती हैं हर्तकी गाछ के तले
पीठ पर जिनके उलंग संथाली लड़के ।

घर मकान कहीं नहीं
इसलिये लगाया मैंने अपना तम्बू नदी के किनारे
संगी नहीं कोई
साथी केवल गमले में वही कैमेलिया ।

कमला आई है माँ के साथ
धूप निकलने से भी पहले
स्निग्ध हेमिल हवा में
शाल बागान के बीच वह जाती है हाथ में छतरी लिये
मैदानी फूल उसके पाँवों में रखते हैं अपना मस्तक
लेकिन क्या देखती भी है वह एक नज़र भर ?

बहुत कम पानी है नदी में
जिसे पैदल ही पार करती है वह
उस पार शीशम के पेड़ तले पढ़ती है कोई किताब
और मुझे वह पहचान गई है, जानता हूँ,
तभी तो जानबूझ कर देखती नहीं मेरी ओर ।

एकदिन देखता हूँ, नदी किनारे रेत पर
वे सब मिलकर करते हैं वनभोज
मन करता है जाकर कहूँ,
'क्या किसी काम नहीं आ सकता मैं ?
नदी से ला सकता हूँ जल भरकर
वन से काठ ला सकता हूँ काटकर
और नहीं तो जंगल में कोई शरीफ भालू
भी क्या नहीं मिल जाता है कभी कभार ?'

देखा उनके दल में एक युवक
शर्ट पहने, रेशम का विलायती जामा,
कमला के पास ही पाँव पसारे
हवाना चुरुट पीता था वह
और कमला, अनमनी सी टुकड़े टुकड़े करती
श्वेतजवा की पंखुड़ियाँ
पास ही पड़ी कोई विलायती मासिक पत्रिका ।

उसी क्षण ज्ञात हुआ,
संथाल परगना के इस निर्जन कोने में
असह्य रुप से अतिरिक्त हूँ मैं, नहीं अँट पाऊँगा कहीं,
लौट जाता उसी क्षण लेकिन एक काम था अभी बाकी

और कुछ ही दिनों में फूटेंगे कैमेलिया के फूल
उन्हें भेजकर पाऊँगा छुट्टी ।
दिनभर कंधे पर बंदूक लिये घूमता हूँ वन जंगल
संध्या से पहले लौटकर गमले को सींचता हूँ
देखता हूँ कली को विकसित होते हुए ।

समय हुआ है आज
उस संथाली कन्या को बुला भेजा है मैंने
जो ले आती है मेरे लिये रसोई के इंधन का काठ
उसी के हाथ भेजूँगा
शाल पत्ते के पात्र में ।

तम्बू के अंदर बैठा पढ़ रहा हूँ जासूसी गल्प
बाहर से मीठे सुर में आती है अवाज, ' बाबू, किसलिए बुलवाया ?'
बाहर आकर देखता हूँ
कैमेलिया का फूल
संथाली कन्या के कान में
श्यामल गालों को आलोकित करता
उसने फिर पूछा, 'किसलिए बुलवाया ?'
कहा मैंने, 'इसी लिये'
और इसके बाद लौट आया कलकत्ता ।

《अनुवाद : नील कमल》

Sunday, December 30, 2018

कविता का काँटा था

वैसी न हों कवितायें 
जैसे ये ऑर्किड के फूल जिन्हें
इनामी नुमाइश के लिये भेजा है
न्यू अलीपुर की मिसेज़ जालान ने 

वैसी तो हरगिज़ न हों वे 
जैसा यह निरापद और सुन्दर 
सर गिरीन्द्रकिशोर रायचौधरी का 
विदेशी नस्ल वाला पालतू कुत्ता जिसे 
इन सर्दियों में वे भेज रहे हैं इनामी शो में 

फूल सी नाजुक और पालतू किस्म की 
कवितायें किसी का क्या बना-बिगाड़ लेंगी भला
उन्हें होना होगा उस जादुई पत्थर की तरह जिसे 
अँधेरे में राह भूले उस मुसाफिर को एक साधु ने दिया
और राह दिखाने के बाद जिसका जादू खत्म हो गया 

मुझे बार बार कचोटती है यह बात 
कि कविता का एक निश्चित प्रयोजन होना चाहिये 
जैसे अभी-अभी अपनी बंशी में मछली फँसाने के लिये
चारा बना रहा है मेरे गाँव का अधेड़ जतनलाल कहार 
(मछलियों की भाषा यदि लिख पाता जतनलाल कहार 
तो आज उसके नाम कोई एक महाकाव्य जरूर होता) 

कोई पूछे मुझसे कि कैसी कविता चाहता हूँ मैं 
तो कहूँगा वह उस काँटे की तरह हो जो धँस जाये 
तुम्हारे कर्णफूलों की जगह और नगीने सी दिपदिप करे 
मछली के काँटे सी बिंध जाये हत्यारे के कण्ठ में और 
लोग कहें कि कविता का काँटा था जिससे मरा हत्यारा 

- नील कमल

Wednesday, May 17, 2017

दुःख सुख के गीत : सात कविताएँ

दुःख सुख के गीत :

।।एक।।

शुक्ल पक्ष का चाँद
अपनी सम्पूर्ण गोलाई में अँट कर
कसमसा रहा था आकाश में,

गर्म भात के टीले पर
छिलके की भूरी कमीज उतार कर
खिला था मक्खन की रंगत वाला एक
पूरा गोल आलू , थाली में।

।।दो।।

एक हल्दी
खिल रही थी साँवली देह पर,
दूसरी
घुल रही थी दाल में,

पीलापन आँच पर पक रहा था ।

।।तीन।।

सिल के साथ जैसे लोढ़ा
रहे हम एक दूसरे के साथ,

जीवन एक मसाला था
जो पिसता रहा, होता रहा
चिकना, और निखरता रहा।

।।चार।।

समय को गूँथा हमने
आटे की तरह
अपनी हथेली के बीच,

गूँथा समय के आटे को
दुःख के खारे पानी में,
बेला संघर्ष के चाक पर,
सेंका फिर उम्मीद की मद्धम आँच पर,

इस तरह कमाई हमने
अपने हिस्से की रोटी ।

।।पाँच।।

नमक का स्वाद सबसे पहले
बताया आँसुओं ने,

पसीने की बूँदों ने
कहा - 'देखो यहाँ है नमक',

नमक को पाया हमने
दो होठों के अंतराल में
जहाँ ठहरा हुआ था
सात समंदर का पानी ।

।।छह।।

क्या था उन अँगुलियों में
जाती रही देह और मन की यंत्रणा,

उस छुअन को ढूँढ़ता हूँ

क्या मुझे कह देना चाहिए
कि जब विदा ले रहा होऊँ
रूप रस गंध से भरी वसुंधरा से
तब और कुछ हो न हो
आत्मा को स्पर्श करती
तुम्हारी अँगुलियाँ हों पास ।

।।सात।।

बार बार आऊँगा
इसी पृथ्वी पर तुम्हें पाने

बार बार भर लूँगा साँसों में
धनिया की पत्ती से आती गमक को

लहसुन के बघार की
महक के लिए देखूँगा
बार बार रसोई की तरफ

हींग की छौंक वाली
गंध के लिए प्यार करूँगा
उन खुरदुरी हथेलियों को ।
______________________
नील कमल
मो. (0)9433123379

Friday, February 24, 2017

सुंदरबन :कुछ कविताएँ

सुंदरबन : कुछ कविताएँ
(नील कमल)

(१)
यह लाल निशान कैसा
जहाँ ठहर जाती है नज़र
रह जाती है उलझ उलझ कर
जल ही जल इस छोर से उस छोर

तटों पर जड़ की मिट्टी झाड़
खड़े तपस्वी सदृश हरे गाछ
किसने बाँध दिए ये लाल निशान
सबसे ऊँची टहनी पर लपेटा इन्हें

संकरी खाड़ी से निकल
बताता है नाविक रुँधे कण्ठस्वर में
यहाँ आया था एक दिन बाघ और
मार कर खा गया एक मछुआरे को

चेतावनी है लाल निशान
यहाँ से गुजरते हुए महसूस करें इसे
एक भूख शिकार करती है दूसरी का
यह जंगल है, यहाँ के नियम नहीं होते ।

(२)
छत्तों से शहद निचोड़ लाते हैं
मिठास की गहरी पहचान रखने वाले
ये मिठास के बदले खरीदना चाहते हैं
थोड़ा नमक, थोड़ी हल्दी और चावल

घने जंगलों में जाना आना है 
नोना जल के बीच रहने वाले ये लोग
पहचानते हैं बाघों और मगरमच्छों को
होता ही रहता है सामना जिनसे प्रायः

काली नहीं पूजते, दुर्गा नहीं पूजते
नहीं पूजते राम, कृष्ण, शिव, विष्णु
बनबीवी को पूजते हैं, निकल पड़ते हैं
उन इलाकों में जहाँ रहते हैं आदमखोर

हर वक़्त बाघ रहता है लगाए घात
पर ये निकल पड़ते हैं शहद की खोज में
कोई गीत गाते हुए बनबीवी की स्मृति में
रोज ही मौत के दरवाजे पर दस्तक देते हैं ।
(नोना जल = खारा पानी ; बनबीवी = सुंदरबन के जंगलों में पूजी जाने वाली किंवदंती देवी)

(३)
कैसे जले चूल्हा, घर में नहीं सूखा काठ
होगला गाछ की टहनियाँ सूखी जंगल में
जंगल में रहता बाघ आदमखोर खूँखार

कैसे पके भात, नहीं अन्न का दाना एक
महाजन के गोदाम में चावल के बोरे सारे
लकड़ियाँ बिकेंगी तभी चढ़ेगी हाँड़ी भात की

नोना जल में माछ, तट पर सोया घड़ियाल है
पाँव धँसे दलदल में, देखो जीवन का ये हाल है ।
(होगला = एक वृक्ष का स्थानीय नाम)

(४)
हेतल वन में रहती है मौत
कि रहता बाघ आदमखोर हेतल वन में
जाना उधर तो चौकन्ना रहना मेरे बच्चों
घात लगाए बैठा होगा छुपकर वहीं कहीं

लग चुका हो खून जिसके मुँह में
उस बाघ का करना तुम शिकार मिल कर
अकेले मत जाना हेतल वन में भूल कर भी ।
(हेतल = सुंदरबन क्षेत्र में पाया जाना वाला एक पेड़)

(५)
तितली अपने पंखों पर उठा ले पहाड़
तो उड़ती हुई दिखेगी बिलकुल ऐसी ही
अभी जैसी दिखती है यह डोंगी, खुली है
जो गोसाबा से लादे द्वीप के अनगिन मानुष ।
(गोसाबा = सुंदरबन के एक द्वीप का नाम)

(६)
जड़ें भी साँस लेती हैं यहाँ
ज़मीन से निकल आती हैं बाहर
हाथ उठाये हों बच्चों ने ज्यों अपनी कक्षा में

ये छरहरे गाछ जो दिखते हैं
मानिनी नायिका से खड़े इन इलाकों में
इनसे ही पाया नाम इस जंगल ने सुंदरबन
ये सुंदरी के गाछ, पंकिल भूमि में ज्यों खिले कँवल ।
(सुंदरी = एक पेड़ का नाम)

(७)
सरकार की चिंता यह नहीं
कितने आदमी मर गए बेमौत

सरकार नहीं जानना चाहती
कितने बच्चों को उठा ले गए बाघ

यह बाघों का अभयारण्य
सरकार की चिंता यहाँ केवल
बाघों को बचाने को लेकर है, और कुछ नहीं ।

(८)
मोहाने पर खड़ी है नाव
ढलते सूर्य का तेज उतर रहा है
दृश्य ऐसा बन रहा है इस वक़्त कि
पानी में अर्घ्य देता हो कोई आकाश से
तरल बिलकुल तरल सोने की धार गिरती
मोहाने पर जहाँ, थाह नहीं मिलता पानी का
एक सोने की तलवार घोंपी हुई दिखती पानी की छाती में ।

(९)
इस खाड़ी प्रदेश में
पहाड़ की नदियाँ खो देती हैं अपनी मिठास
एक खारेपन में घुलने लगता है वजूद उनका
इसके घावों से नमक का रिश्ता बहुत पुराना है
दारुण दुःख की अंतहीन एक गाथा है सुंदरबन ।

(१०)
क्या जानो तुम
उस आदमी का दुःख
महज थोड़े से साग और कुछ
मछलियों के सहारे लड़ता रहा जो अपनी भूख से
तुम्हारे लिए यह दो दिन एक रात का पैकेज टूर है ।

★★    ★★    ★★

नील कमल

मेल : neel.kamal1710@gmail.com
मोबाइल नंबर : 9433123379.

Thursday, January 5, 2017

बीता साल साथ चला आता था..

दिसम्बर की धूल लगी
वही घिसी और पुरानी जींस पहने
मैं चला आया था जनवरी के महीने में

जेबों में अब भी कहीं
पड़ा था बीते अक्टूबर का सूखा एक फूल
अब भी गीली थी मेरी
वह नीली कमीज जुलाई की बौछारों से

मेरी रुमाल में अब भी सहमा
पड़ा था मई की धूप का गर्म एक टुकड़ा
यादें भी पिछले मार्च की
चुभती थीं रह रह कर हवा जब भी चलती

यह किस नये साल में आ गया था मैं
जिसमें पूरा का पूरा बीता साल साथ चला आता था ।

- नील कमल