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Tuesday, May 16, 2023

चार कविताएँ


(१) अमलतास 

गुलमोहर ने

कुहनी गड़ा दी

अमलतास की कमर में,

और पलट कर

थपकी दी अमलतास ने

गुलमोहर की पीठ पर |

ठीक उसी वक्त

खिल उठा कनेर का चेहरा,

पीपल के होठों पर

उतर आई अजीब सी एक चमक,

एक बच्चा कटहल

हरी काँटेदार त्वचा वाला

उमग कर चिपका रहा

अधेड़ पिता के कंधे से

और उसके भीतर सोये

कोये गुदगुदी महसूस करते रहे

गुलमोहर की शरारत पर |

गुलमोहर और अमलतास

हँसते रहे, जैसे

बेखयाली में हँस-हँस कर

दोहरी हुई जाती हों

दो अल्हड़ सहेलियाँ |

वहीं कहीं

पराजित हो दुबका रहा

हिन्दी का एक किताबी मुहावरा

लाल-पीला होता रहा समय का चेहरा

गुस्से से नहीं, प्रेम से तृप्त और अघाया हुआ |

(२) श्रावण

आषाढ़-पिता की गोद से

अभी-अभी उतरा है श्रावण-शिशु |

पृथ्वी का सारा दुःख

पृथ्वी का सारा संताप

धुल गया है बारिश में |

फूलों में रंग है पहले से ज्यादा

पत्तियों में चमक रोज से ज्यादा |

नहा कर खिल उठी है पृथ्वी की देह,

मातृत्व के दर्प में चमकती हुई आदिम स्त्री देह |

(३) दुविधा – एक

उस वक्त

जबकि मेरी कनपटी पर

सटी थी आततायी की बंदूक

ईश्वर को नींद आ गई थी |

ईश्वर की शपथ लेकर

जिन्होंने जताई थी आस्था

दुनिया की सबसे मोटी किताब में

उनके लिए, उस वक्त

संविधान, कबाड़ी वाले के यहाँ

पड़ी किसी किताब से अधिक नहीं था |

तय मुझे करना था,

मारा जाऊँ, एक किताब में

लिखे शब्दों को बचाते हुए

या दोनों हाथ ऊपर कर दूँ |

(४) दुविधा – दो

सच बोलूँगा और मारा जाऊँगा

बोलूँगा झूठ तो थोड़ी देर और

रह जाऊँगा ज़िंदा |

चुप रहूँगा तो शायद

बचा रहूँ कुछ और दिन |

मेरे भीतर छुप कर बैठा

मिडिल क्लास आदमी

चाहता है साध लूँ चुप्पी

और निहायत ही मुश्किल लगे

अगर चुप रहना, तो बोल दूँ झूठ

और बच निकलूँ फिलहाल |

मेरे भीतर तभी सिर उठा कर

खड़ा होता है एक कवि

मेरा कवि मुझे सच कहने को तत्पर करता है |

_________________
अनहद -6 (संपादक : संतोष चतुर्वेदी), इलाहबाद , में प्रकाशित

Wednesday, January 13, 2021

उम्मीद न करें जनाब



इतना साधु कभी हो नहीं पाया
कि हत्यारे से कहूँ जाओ माफ़ किया

दुःख के पोखर में जिसने डुबोया
दुःख की नदी में डूबकर मरे यही चाहा

मुट्ठीभर फल खाने वालों के लिए
कोटि कोटि जन को कर्म की नसीहत करने वाले
धर्मग्रंथ को क्यों न फूँक कर ताप लूँ इसी जाड़े में

पिद्दी सी प्रजा हूँ तो क्या
जिस राजा ने नरक बनाया जीवन जन जन का
सरापता हूँ मर जाये जैसे ही करे अगला अन्याय

बेईमान न्यायाधीश लिखने को हो
जब कोई फैसला वंचित जन के हक़ के ख़िलाफ
कोढ़ फूटे उसकी अँगुलियों में और कलम छूट जाए

कवि से उम्मीद न करें जनाब
कि करेगा वह हुस्न और इश्क़ की बातें ऐसे वक़्त
तिलमिलाहट से न भर दे कागज पर छपी कविता
उसे कुत्ते की पूँछ में बाँध दीजिए ।

- नील कमल 

Thursday, October 22, 2020

जीवन

      (पोस्टर में उपयोग किया गया चित्र गूगल से साभार)


बीज जितना ही निर्दोष था मैं
फोड़कर उग सकने योग्य भूमि हेतु
भटकना था मुझे इस प्रांत से उस प्रांत

पत्तियों जितना ही औदार्य था मुझमें
जीवन को उसकी अंतिम बूँद तक सोख
रेशा रेशा हो जाना था माटी में आखिरकार

काँटों जितना ही उपेक्षित भी था मैं
फूल जैसे लोगों के बीच रहा निष्प्रयोजन
बच बचा कर मुझसे निकले तमाम भले लोग ।

- नील कमल 

Monday, September 16, 2019

कृष्णचूड़ा राधाचूड़ा

ये जो लाल लाल फूल हैं
हरे के बीच खिले चटक
इन्हें क्या कहती हो तुम ?

अरे ! यह भी नहीं जानते ?
इन्हें कृष्णचूड़ा कहते हैं, ठीक है ?

अच्छा, ये जो पीले पीले फूल हैं उधर
गुच्छों में, शायद पहचानता हूँ मैं इन्हें,
सच सच कहो, ये अमलतास ही हैं न ?

कुछ भी नहीं पहचानते तुम ठीक ठाक
देखो, ये राधाचूड़ा के फूल हैं, ठीक है ?

ठीक है, ठीक है लड़की,
आती है एक ऋतु जिसमें
फूलों के नाम याद नहीं रहते
इन्हीं ऋतुओं में ठीक ठीक पहचाने जाते हैं फूल ।

- नील कमल

Thursday, June 13, 2019

पुरुलिया

फुदकती हुई मैना
आ धमकती है बीच सड़क
और ढीला पड़ने लगता है
पाँव का दबाव एक्सीलेरेटर पर

बकरियाँ दलबद्ध
पार करती हैं पिच वाली सड़क
टुनटुन बजती हैं गले की घंटियाँ
भूले से भी नहीं बजाता हॉर्न टूरिस्ट गाड़ी का ड्राइवर

बिना भय के मोर
बच्चों के झुण्ड के साथ पार करता है सड़क
कहीं कोई नहीं होता हैरान इसअद्भुत दृश्य पर

सभ्यता के नक्शे पर एक पिछड़ा इलाका है यह
मनुष्यता की देह यहाँ गीली है पसीने के नमक से

पृथ्वी के सकुचाये मुख पर
मल दिया है किसी ने रक्तपलाश का रंग

पहाड़ की दो चोटियों के फाँक से
सोने की गेंद सा उछल आया है दोल पूर्णिमा का चाँद ।

- नील कमल

Friday, June 7, 2019

वे आ रहे हैं

पूरब से आई आवाज़, वे आ रहे हैं
पश्चिम से गूँजा नारा, हाँ वे आ रहे हैं
उत्तर-दक्षिण में उनके आने की घोषणाएँ थीं

मुँह उठाये वे आते थे
वे आते थे और सीधे मंचों पर चढ़ जाते थे
मंचों पर चढ़ कर वे कविताओं का पाठ करते थे

जितनी देर वे पाठ करते अपनी कविताएँ
उतनी देर के लिये सोने चले जाते थे हत्यारे
उतनी देर के लिये फूल ही फूल खिल जाते थे

वे प्रेम कविताओं के कवि थे
और हर हाल में बचा लेना चाहते थे प्रेम
प्रेम को बचाने के लिये वे कविताएँ लिखते थे

वे इस कदर डूबे थे प्रेम में
कि फ्रेम के बाहर नहीं देखते थे नज़र उठा कर
फ्रेम के बाहर की दुनिया उनकी दुनिया नहीं थी

वे दर्शनीय कवि थे
वे प्रदर्शनीय कवि थे
किंतु सदा संशय रहता उन्हें अपने विश्वसनीय होने पर ।

- नील कमल

Wednesday, May 17, 2017

दुःख सुख के गीत : सात कविताएँ

दुःख सुख के गीत :

।।एक।।

शुक्ल पक्ष का चाँद
अपनी सम्पूर्ण गोलाई में अँट कर
कसमसा रहा था आकाश में,

गर्म भात के टीले पर
छिलके की भूरी कमीज उतार कर
खिला था मक्खन की रंगत वाला एक
पूरा गोल आलू , थाली में।

।।दो।।

एक हल्दी
खिल रही थी साँवली देह पर,
दूसरी
घुल रही थी दाल में,

पीलापन आँच पर पक रहा था ।

।।तीन।।

सिल के साथ जैसे लोढ़ा
रहे हम एक दूसरे के साथ,

जीवन एक मसाला था
जो पिसता रहा, होता रहा
चिकना, और निखरता रहा।

।।चार।।

समय को गूँथा हमने
आटे की तरह
अपनी हथेली के बीच,

गूँथा समय के आटे को
दुःख के खारे पानी में,
बेला संघर्ष के चाक पर,
सेंका फिर उम्मीद की मद्धम आँच पर,

इस तरह कमाई हमने
अपने हिस्से की रोटी ।

।।पाँच।।

नमक का स्वाद सबसे पहले
बताया आँसुओं ने,

पसीने की बूँदों ने
कहा - 'देखो यहाँ है नमक',

नमक को पाया हमने
दो होठों के अंतराल में
जहाँ ठहरा हुआ था
सात समंदर का पानी ।

।।छह।।

क्या था उन अँगुलियों में
जाती रही देह और मन की यंत्रणा,

उस छुअन को ढूँढ़ता हूँ

क्या मुझे कह देना चाहिए
कि जब विदा ले रहा होऊँ
रूप रस गंध से भरी वसुंधरा से
तब और कुछ हो न हो
आत्मा को स्पर्श करती
तुम्हारी अँगुलियाँ हों पास ।

।।सात।।

बार बार आऊँगा
इसी पृथ्वी पर तुम्हें पाने

बार बार भर लूँगा साँसों में
धनिया की पत्ती से आती गमक को

लहसुन के बघार की
महक के लिए देखूँगा
बार बार रसोई की तरफ

हींग की छौंक वाली
गंध के लिए प्यार करूँगा
उन खुरदुरी हथेलियों को ।
______________________
नील कमल
मो. (0)9433123379

Friday, February 24, 2017

सुंदरबन :कुछ कविताएँ

सुंदरबन : कुछ कविताएँ
(नील कमल)

(१)
यह लाल निशान कैसा
जहाँ ठहर जाती है नज़र
रह जाती है उलझ उलझ कर
जल ही जल इस छोर से उस छोर

तटों पर जड़ की मिट्टी झाड़
खड़े तपस्वी सदृश हरे गाछ
किसने बाँध दिए ये लाल निशान
सबसे ऊँची टहनी पर लपेटा इन्हें

संकरी खाड़ी से निकल
बताता है नाविक रुँधे कण्ठस्वर में
यहाँ आया था एक दिन बाघ और
मार कर खा गया एक मछुआरे को

चेतावनी है लाल निशान
यहाँ से गुजरते हुए महसूस करें इसे
एक भूख शिकार करती है दूसरी का
यह जंगल है, यहाँ के नियम नहीं होते ।

(२)
छत्तों से शहद निचोड़ लाते हैं
मिठास की गहरी पहचान रखने वाले
ये मिठास के बदले खरीदना चाहते हैं
थोड़ा नमक, थोड़ी हल्दी और चावल

घने जंगलों में जाना आना है 
नोना जल के बीच रहने वाले ये लोग
पहचानते हैं बाघों और मगरमच्छों को
होता ही रहता है सामना जिनसे प्रायः

काली नहीं पूजते, दुर्गा नहीं पूजते
नहीं पूजते राम, कृष्ण, शिव, विष्णु
बनबीवी को पूजते हैं, निकल पड़ते हैं
उन इलाकों में जहाँ रहते हैं आदमखोर

हर वक़्त बाघ रहता है लगाए घात
पर ये निकल पड़ते हैं शहद की खोज में
कोई गीत गाते हुए बनबीवी की स्मृति में
रोज ही मौत के दरवाजे पर दस्तक देते हैं ।
(नोना जल = खारा पानी ; बनबीवी = सुंदरबन के जंगलों में पूजी जाने वाली किंवदंती देवी)

(३)
कैसे जले चूल्हा, घर में नहीं सूखा काठ
होगला गाछ की टहनियाँ सूखी जंगल में
जंगल में रहता बाघ आदमखोर खूँखार

कैसे पके भात, नहीं अन्न का दाना एक
महाजन के गोदाम में चावल के बोरे सारे
लकड़ियाँ बिकेंगी तभी चढ़ेगी हाँड़ी भात की

नोना जल में माछ, तट पर सोया घड़ियाल है
पाँव धँसे दलदल में, देखो जीवन का ये हाल है ।
(होगला = एक वृक्ष का स्थानीय नाम)

(४)
हेतल वन में रहती है मौत
कि रहता बाघ आदमखोर हेतल वन में
जाना उधर तो चौकन्ना रहना मेरे बच्चों
घात लगाए बैठा होगा छुपकर वहीं कहीं

लग चुका हो खून जिसके मुँह में
उस बाघ का करना तुम शिकार मिल कर
अकेले मत जाना हेतल वन में भूल कर भी ।
(हेतल = सुंदरबन क्षेत्र में पाया जाना वाला एक पेड़)

(५)
तितली अपने पंखों पर उठा ले पहाड़
तो उड़ती हुई दिखेगी बिलकुल ऐसी ही
अभी जैसी दिखती है यह डोंगी, खुली है
जो गोसाबा से लादे द्वीप के अनगिन मानुष ।
(गोसाबा = सुंदरबन के एक द्वीप का नाम)

(६)
जड़ें भी साँस लेती हैं यहाँ
ज़मीन से निकल आती हैं बाहर
हाथ उठाये हों बच्चों ने ज्यों अपनी कक्षा में

ये छरहरे गाछ जो दिखते हैं
मानिनी नायिका से खड़े इन इलाकों में
इनसे ही पाया नाम इस जंगल ने सुंदरबन
ये सुंदरी के गाछ, पंकिल भूमि में ज्यों खिले कँवल ।
(सुंदरी = एक पेड़ का नाम)

(७)
सरकार की चिंता यह नहीं
कितने आदमी मर गए बेमौत

सरकार नहीं जानना चाहती
कितने बच्चों को उठा ले गए बाघ

यह बाघों का अभयारण्य
सरकार की चिंता यहाँ केवल
बाघों को बचाने को लेकर है, और कुछ नहीं ।

(८)
मोहाने पर खड़ी है नाव
ढलते सूर्य का तेज उतर रहा है
दृश्य ऐसा बन रहा है इस वक़्त कि
पानी में अर्घ्य देता हो कोई आकाश से
तरल बिलकुल तरल सोने की धार गिरती
मोहाने पर जहाँ, थाह नहीं मिलता पानी का
एक सोने की तलवार घोंपी हुई दिखती पानी की छाती में ।

(९)
इस खाड़ी प्रदेश में
पहाड़ की नदियाँ खो देती हैं अपनी मिठास
एक खारेपन में घुलने लगता है वजूद उनका
इसके घावों से नमक का रिश्ता बहुत पुराना है
दारुण दुःख की अंतहीन एक गाथा है सुंदरबन ।

(१०)
क्या जानो तुम
उस आदमी का दुःख
महज थोड़े से साग और कुछ
मछलियों के सहारे लड़ता रहा जो अपनी भूख से
तुम्हारे लिए यह दो दिन एक रात का पैकेज टूर है ।

★★    ★★    ★★

नील कमल

मेल : neel.kamal1710@gmail.com
मोबाइल नंबर : 9433123379.

Monday, April 18, 2016

दो कविताएँ

एक : पतंग
__________

प्रार्थनाएँ सारी
स्थिगित रहेंगी इस समय

स्थगित रहेंगी सारी इच्छाएँ
विराम देने का मन है इसी क्षण
अब तक जारी सारी लड़ाइयों को

इस समय एक लड़की
उड़ा रही है पतंग पूरे उल्लास से
आसमान में इतरा रही है पतंग

हरी कमीज पर पीला
दुपट्टा ओढ़े इस लड़की का नाम
चुमकी, झिलिक, शगुफ़्ता या पारमिता
इनमें से कुछ भी हो, क्या फ़र्क पड़ता है,

नंगे पाँव थिरकती है
लड़की, जिसका हौसला
इस समय सातवें आसमान पर है,
 
पतंग गुदगुदा रही है आसमान को
ठीक उस जगह जहाँ ज़रा सा छू दे
तो खिलखिला कर हँसती है आत्मा

ये लड़की के फुरसत के लम्हे हैं
माँ का कहा हर काम निबटा कर
अपने स्कूल के बस्ते से बेखबर
वह कर रही है बातें आसमान से

आसमान की गुदगुदी उतरती है
डोर के सहारे अब नीचे की ओर
धीरे धीरे फैल जाती है होठों पर

धूप का सबसे चमकीला टुकड़ा
अब खिलता है उसकी आँखों में

ओ रे चुमकी
सुन ओ झिलिक
अरी ओ शगुफ़्ता
हाँ रे पारमिता सुन
तेरी डोर से जोड़ रहा हूँ साँसें
धरती का सारा शीशा पीस कर
आ मल दूँ इन धागों पर, तब तक
स्थगित रहें सारी प्रार्थनाएँ, सारी
इच्छाएँ और सारी जरुरी लड़ाइयाँ ।

_____________________________

दो : नृत्य
________

।।नृत्य - एक।।

नृत्य का तय अर्थ है
अर्थ है इसीलिए तय
व्याकरण भी है नृत्य का

यह नर्तकी इसलिए
नहीं कर रही है नृत्य
कि यह बसन्त का समय है

किसी भी मौसम में
यह नाचती है इसी तरह
नाचना इसके लिए लड़ने जैसा है ।

।।नृत्य - दो।।

नाचना एक काम भी हो सकता है
जैसे पत्थर तोड़ना, जैसे कुँए खोदना
जैसे नहरें निकालना, जैसे सुरंगें बनाना

जरुरी नहीं कि जो नाच रहा है
वह खुशी-ख़ुशी और उमग कर नाचता हो

नाचना एक काम भी हो सकता है ।

।।नृत्य - तीन।।

उसने देख लिए हैं
रंग ढेर सारे
यह उसके नाचने का समय है

उसे मिल गया है
फूलों का ठिकाना
यह उसके नाचने का समय है

उसे लूटना है
ढेर सारा पराग
यह उसके नाचने का समय है ।

।।नृत्य - चार।।

वे नाच रही हैं
और नाचते हुए
हवा पर लिख रही हैं
पैगाम अपने दोस्तों के लिए

एक आदिम भाषा की
लिपि उभर रही है हवा में
और विस्मय के साथ पढ़ी जा रही है

शायद यह सृष्टि की
पहली ही कोरियोग्राफी है
जिसके बारे में स्वर्ग की अप्सराओं
से भी पहले पता था मधुमक्खियों* को ।

(मधुमक्खियों का विशेष नृत्य, 'वैगल डांस')

- नील कमल

।। इंद्रप्रस्थ भारती, जनवरी-मार्च 2016 अंक में प्रकाशित ।।