Wednesday, May 8, 2019

कैमेलिया / रवींद्रनाथ ठाकुर

कमला नाम है उसका
देखता हूँ लिखा उसकी नोटबुक पर
वह जाती थी ट्राम में, भाई के साथ कॉलेज के रास्ते
मैं बैठा ठीक पिछ्ली बेंच पर
चेहरे की सुघड़ रेखा इस तरफ से देती दिखाई
और गर्दन पर रोंये कोमल जूड़े के ठीक नीचे
गोद में उसकी किताबें और नोटबुक,
जहाँ उतरना था मुझे वहाँ उतरना न हुआ मेरा ।

अब वक़्त का हिसाब करके निकलता हूँ बाहर
हिसाब वक़्त का मेरे काम से मेल खाता है ऐसा नहीं
अक्सर मेल खाता है वक़्त उनके बाहर निकलने से
अक्सर ही देखता हूँ उन्हें
सोचता मन ही मन, कोई और रिश्ता न सही
वह मेरी सहयात्रिणी तो है ।
निर्मल बुद्धि चेहरा उसका झिलमिल करता हो जैसे
सुकुमार मस्तक से ऊपर को सँवारे गए उसके केश
उज्वल आँखों की निस्संकोच दृष्टि ।

सोचता हूँ मन में, कोई संकट ही आ क्यों नहीं जाता
उद्धार कर सार्थक कर लूँ यह जन्म
रास्ते में कहीं कोई उत्पात
या किसी गुण्डे की स्पर्धा
ऐसा तो होता ही है आजकल
लेकिन भाग्य मेरा मटमैले पानी वाला गड्ढा
बड़ा कोई इतिहास उसमें समाता नहीं
दिन बेचारे मेंढक की तरह एकरस पुकारते
नहीं जिसमें मगरमच्छों घड़ियालों का निमंत्रण
और न ही निमंत्रण किसी राजहंस का ।

एकदिन थी रेलपेल वाली भीड़ ट्राम में
कमला के बगल में बैठा कोई आधा-अंग्रेज,
जी किया, अकारण ही टोपी उछाल दूँ उसके सिर से,
पकड़ के उसकी गर्दन उतारूँ उसे रास्ते पर,
कोई बहाना नहीं मिलता
हाथ कसमसाते रहे मेरे
कि तभी एक मोटा चुरुट सुलगा कर कश लगाया उसने

पास उसके आकर कहा मैंने - 'फेंको यह चुरुट' !
मानो सुना ही नहीं उसने
धुँए के छल्ले उड़ाने लगा वह
मुँह से उसके खींच कर चुरुट मैंने फेंक दिया सड़क पर
वह ताकता रहा गुस्से में मुट्ठियाँ अपनी कसते हुए
लेकिन कहते कुछ न बना उससे
एक छलाँग में कूद कर उतर गया वह ट्राम से
शायद वह पहचानता है मुझे
फुटबॉल के खेल में आखिर नाम है मेरा
और नाम खूब अच्छाखासा है ।

लाल हो उठा मुख उसका
खोल कर किताब पढ़ने का अभिनय वह करती रही
कटाक्ष भर भी नहीं देखा इस वीरपुरुष की ओर
ऑफिस जाते बाबुओं ने कहा - 'बहुत सही किया श्रीमान' !
थोड़ी ही देर बाद वह उतर गई गंतव्य से पहले ही
टैक्सी लेकर वह चली गई ।

अगले दिन नहीं दिखी वह
और उसके अगले दिन भी नहीं
तीसरे दिन देखा उसे
ठेलागाड़ी में जाती थी कॉलेज
समझा, कि गलती की मैंने गँवारों की तरह,
अपनी जिम्मेदारी वह खुद उठा सकती है
मेरी कोई जरूरत वहाँ थी ही नहीं
फिर दोहराया मैंने, 'भाग्य मेरा
मटमैले पानी वाला गड्ढा'
बहादुरी की स्मृति आज केवल
मेंढक की टर्राहट सी बजती है मन में
तय किया मैंने, यह गलती सुधारनी ही होगी ।

खबर आई है, वे लोग दार्जीलिंग आते हैं गर्मियों में
इस बार हवा बदलने की जरूरत मुझे भी महसूस हुई
छोटा सा उनका घर - नाम जिसका मोतिया
रास्ते से उतर कर थोड़ा नीचे की ओर कोने में
पेड़ के झुरमुट में, सामने जिसके बर्फीले पहाड़ ।
सुना, इस बार नहीं आ रहे वे
लौट चलूँ सोचता हूँ कि तभी मिल गये एक भक्त
मोहनलाल -
दुबला शरीर, लम्बा कद, आँख पर चश्मा
कमजोर पेट को दार्जीलिंग की हवा रास आती है
बोले, 'तनुका, मेरी बहन,
नहीं छोड़ेगी मुझे जबतक आपसे न मिलवा दूँ उसे'
बिलकुल छाया सी थी वह
देह इतनी हल्की कि जितने के बिना होना संभव नहीं
फुटबॉल के इस सरदार के प्रति अद्भुत उसकी यह भक्ति
सोचती है वह, मिलने जाना मेरा उसके प्रति दुर्लभ दया,
हाय रे भाग्य का यह खेल !

जिस दिन उतर आऊँगा नीचे, उससे दो दिन पहले
बोली तनुका, 'एक चीज दूँगी आपको जिससे
आपको आती रहेगी हम सबकी याद,
वह एक फूल वाला पौधा' ।
यह कैसा उत्पात, चुप ही रहा मैं सुनकर
तनुका बोली, 'दुर्लभ और कीमती है यह पौधा,
इस देश की माटी में मुश्किल से बच पाता है'
पूछा मैंने, 'नाम क्या है इसका ?'
उसने कहा, ' कैमेलिया' ।
हैरत हुई, और एक नाम तभी कौंध गया मन के अँधेरे में
हँसकर मैंने कहा, 'कैमेलिया,
सहज ही मेल नहीं खाता इसका मन शायद'
तनुका ने जाने क्या समझा, हठात शरमा गयी वह
लेकिन खुश भी दिखी ।

गमले में पौधा लिये चला मैं
देखा, बगल में बैठी सहयात्रिणी असहज थी,
दो डिब्बों वाली गाड़ी में
छुपाया मैंने गमले को निचले डिब्बे में ।
खैर, छोड़िये यह भ्रमण वृत्तांत
जाने दीजिये महीनों की तुच्छता को ।

पूजा की छुट्टियों में उठा परदा
संथाल परगना में,
छोटी सी वह जगह, नाम नहीं बताऊँगा
हवा बदल के लिये घूमने वाले इस जगह के बारे में नहीं जानते ।
कमला के मामा थे इंजीनियर,
यहीं घरबार था जिनका
शालवन की छाया में
गिलहरियों के इस मुहल्ले में
जहाँ दिगंत में दिखते नीले पहाड़
पास ही रेत के बीच बहती जल की धार
पलाशवन में जहाँ तसर की गोटियाँ
भैंसें जहाँ चरती हैं हर्तकी गाछ के तले
पीठ पर जिनके उलंग संथाली लड़के ।

घर मकान कहीं नहीं
इसलिये लगाया मैंने अपना तम्बू नदी के किनारे
संगी नहीं कोई
साथी केवल गमले में वही कैमेलिया ।

कमला आई है माँ के साथ
धूप निकलने से भी पहले
स्निग्ध हेमिल हवा में
शाल बागान के बीच वह जाती है हाथ में छतरी लिये
मैदानी फूल उसके पाँवों में रखते हैं अपना मस्तक
लेकिन क्या देखती भी है वह एक नज़र भर ?

बहुत कम पानी है नदी में
जिसे पैदल ही पार करती है वह
उस पार शीशम के पेड़ तले पढ़ती है कोई किताब
और मुझे वह पहचान गई है, जानता हूँ,
तभी तो जानबूझ कर देखती नहीं मेरी ओर ।

एकदिन देखता हूँ, नदी किनारे रेत पर
वे सब मिलकर करते हैं वनभोज
मन करता है जाकर कहूँ,
'क्या किसी काम नहीं आ सकता मैं ?
नदी से ला सकता हूँ जल भरकर
वन से काठ ला सकता हूँ काटकर
और नहीं तो जंगल में कोई शरीफ भालू
भी क्या नहीं मिल जाता है कभी कभार ?'

देखा उनके दल में एक युवक
शर्ट पहने, रेशम का विलायती जामा,
कमला के पास ही पाँव पसारे
हवाना चुरुट पीता था वह
और कमला, अनमनी सी टुकड़े टुकड़े करती
श्वेतजवा की पंखुड़ियाँ
पास ही पड़ी कोई विलायती मासिक पत्रिका ।

उसी क्षण ज्ञात हुआ,
संथाल परगना के इस निर्जन कोने में
असह्य रुप से अतिरिक्त हूँ मैं, नहीं अँट पाऊँगा कहीं,
लौट जाता उसी क्षण लेकिन एक काम था अभी बाकी

और कुछ ही दिनों में फूटेंगे कैमेलिया के फूल
उन्हें भेजकर पाऊँगा छुट्टी ।
दिनभर कंधे पर बंदूक लिये घूमता हूँ वन जंगल
संध्या से पहले लौटकर गमले को सींचता हूँ
देखता हूँ कली को विकसित होते हुए ।

समय हुआ है आज
उस संथाली कन्या को बुला भेजा है मैंने
जो ले आती है मेरे लिये रसोई के इंधन का काठ
उसी के हाथ भेजूँगा
शाल पत्ते के पात्र में ।

तम्बू के अंदर बैठा पढ़ रहा हूँ जासूसी गल्प
बाहर से मीठे सुर में आती है अवाज, ' बाबू, किसलिए बुलवाया ?'
बाहर आकर देखता हूँ
कैमेलिया का फूल
संथाली कन्या के कान में
श्यामल गालों को आलोकित करता
उसने फिर पूछा, 'किसलिए बुलवाया ?'
कहा मैंने, 'इसी लिये'
और इसके बाद लौट आया कलकत्ता ।

《अनुवाद : नील कमल》

Wednesday, February 27, 2019

चेहरे व अन्य कविताएँ

चेहरे ..

कभी आऊँगा उज्जैन तो

आऊँगा जरूर आपके घर

कही जब मैंने यह बात कवि चंद्रकांत देवताले से

हँसते हुए बोले, उज्जैन में और है भी क्या देखने लायक

उज्जैन में दो ही तो चीजें हैं - एक महाकाल, दूसरा देवताले

चौरंगी रोड के चौधरी एस्टेट गेस्टहाउस वाले कमरे में तैरती उस हँसी का गवाह सिर्फ़ मैं था

सच है कि हर शहर का एक चेहरा होता है

जैसे कि चंद्रकांत देवताले का चेहरा था उज्जैन का चेहरा

उज्जैन जहाँ मैं कभी नहीं गया लेकिन जिसे पहचानता रहा इसी तरह

चन्द्रमा को गिटार की तरह बजाने वाला वह कवि तो अब रहा नहीं उज्जैन में

लेकिन एक नया चेहरा उज्जैन का अब भी है जो कविमित्र नीलोत्पल से मिलता है

जाऊँगा कभी उज्जैन तो नीलोत्पल से मिलूँगा

इंदौर जाऊँगा तो जरूर मिलूँगा आशुतोष दुबे से

गोरखपुर जाऊँगा जब भी तो गणेश पाण्डेय से मिलूँगा

जाऊँगा इलाहाबाद तो संतोष चतुर्वेदी से मिलूँगा, मिलूँगा सुबोध शुक्ल से

बनारस जाऊँगा अगली बार तो हमेशा की तरह मिलूँगा ज्ञानेन्द्रपति से गोदौलिया पर

बाँदा जाऊँगा तो मिलूँगा केशव तिवारी से, कानपुर में बाबूपुरवा वाले श्रमिक जी से मिलूँगा

कितनी-कितनी जगहों के कितने-कितने चेहरे बना रखे हैं मैंने

मैं शहरों को और गाँवों को इसी तरह पहचानता रहा हूँ अब तक

कितने धुले-धुले और साफ-साफ नजर आते हैं ये सब दूर से भी

लेकिन जब-जब सोचता हूँ दिल्ली के बारे में सब गड्डमड्ड हो जाता है

इतना मेकअप है दिल्ली के चेहरे पर कि पहचान नहीं पाता दिल्ली को

पूछता हूँ खुद से - कहो नील कमल, किससे मिलोगे जब जाओगे दिल्ली ?

◆

घर ..

(कवि अग्निशेखर के लिए)

कितनी हसरत से कोई आदमी बनाता है एक घर

उसे क्या पता एक दिन कुछ उन्मादी आयेंगे और

कहेंगे उसे अपना घर छोड़ कर चले जाने के लिए

लम्बी एक साँस छोड़ता है वह और चल पड़ता है

मय सरोसामान एकदिन चल पड़ता है अँधेरे में ही 

आँखों में नदियों का जल थामे वह चल पड़ता है

सीने बीच धधकती आग छुपाए वह चल पड़ता है

पीठ पर उसके एक बक्सा होता है लोहे का, उसमें

जितना अँटता है सामान उससे ज्यादा छूट जाता है

घर में छूट गए खुशियों के दिन बड़ी दूर तक उसके

पीछे पीछे चलते हैं और थककर घर में लौट जाते हैं

पीछे मुड़कर आखिरी बार के लिए वह देखता है घर

और जलता हुआ पाता है अपने देखे हुए सपनों को

पास उसके भारी गठरी में अब कोई सपना भी नहीं

सपनों से खाली अपनी गठरी उठाये वह चल देता है

किसी एक भयंकर रात में वह घिरा होता है आग से

उसके गले से फूटती है घुटती हुई एक करुण पुकार

पानी पानी पुकारता है वह नींद खुल जाने के बाद तक

और पाता है एक तम्बू ही अब उसका स्थायी निवास है 

जलावतनी में बेघर हो गए आदमी की पुकार को सुनो

उसकी भाषा में तुम मत ढूँढ़ो व्याकरण की त्रुटियों को

मत पूछो उससे कि कहाँ कहाँ दस्तखत कर दिए उसने

मत पूछो किन जुलूसों में और क्योंकर चलता रहा वह

घर लुट गया जिसका उसे घर लौटाओ फिर बात करो उससे ।

◆

निर्विरोध ..

कुछ नहीं हुआ

कुछ भी तो नहीं हुआ

सरकार का इकबाल बुलन्द हो

गिनती की हत्याएँ हुईं - कुछ नहीं हुआ

थोड़े लोग जख्मी हुए - कुछ नहीं हुआ

लोग इलाक़ाबदर हुए - कुछ नहीं हुआ

कहीं कुछ नहीं हुआ, कुछ भी तो नहीं हुआ

सरकार, आप फिर चुन लिए गए निर्विरोध !

◆

जगह ..

एक जगह थी

जहाँ आँख मूँद कर

जाया जा सकता था किसी भी वक़्त

अपने कवच उतार कर, एकदम बेफिक्र

एक जगह थी

जहाँ अँधेरे में भी

प्रवेश किया जा सकता था कभी भी

अपने हथियार छोड़कर, बिलकुल बेहिचक

एक ही तो जगह थी

जहाँ के चप्पे-चप्पे को पहचानते थे कदम

जहाँ के रेशे-रेशे में ऐतबार एक था हरदम

मरण फाँद यह कौन रख गया, ठीक उसी जगह ?

◆

बैलट बाबा ..

बैलट बाबा

खून खराबा

कितना और चलेगा

अब तक जानें कितनी चली गई हैं

घर-वर और दुकानें कितनी चली गई हैं

आग लगी है चहुँदिस धू-धू जलता देखो

खड्गहस्त हत्यारा छुट्टा चलता देखो

किससे कौन लड़ेगा झगड़ा यहाँ फँसा है

कहाँ कौन है तगड़ा रगड़ा यहाँ फँसा है

प्रजातंत्र की गाय दुधारू जाने कब से दूह रहे वे

सानी-पानी किए बिना ही दूध मलाई लूट रहे वे

इससे तो बढ़िया पानीपत

और पलासी के मैदानों में वे लड़ते औ' मरते

मध्ययुगी नियमों से इक्कीसवीं सदी के लोकतंत्र

के रक्त सने अध्यायों का ऐसा पाठ न करते ।

◆

[कविता बिहान, दिसम्बर 2018 अंक में प्रकाशित]

Sunday, December 30, 2018

कविता का काँटा था

वैसी न हों कवितायें 
जैसे ये ऑर्किड के फूल जिन्हें
इनामी नुमाइश के लिये भेजा है
न्यू अलीपुर की मिसेज़ जालान ने 

वैसी तो हरगिज़ न हों वे 
जैसा यह निरापद और सुन्दर 
सर गिरीन्द्रकिशोर रायचौधरी का 
विदेशी नस्ल वाला पालतू कुत्ता जिसे 
इन सर्दियों में वे भेज रहे हैं इनामी शो में 

फूल सी नाजुक और पालतू किस्म की 
कवितायें किसी का क्या बना-बिगाड़ लेंगी भला
उन्हें होना होगा उस जादुई पत्थर की तरह जिसे 
अँधेरे में राह भूले उस मुसाफिर को एक साधु ने दिया
और राह दिखाने के बाद जिसका जादू खत्म हो गया 

मुझे बार बार कचोटती है यह बात 
कि कविता का एक निश्चित प्रयोजन होना चाहिये 
जैसे अभी-अभी अपनी बंशी में मछली फँसाने के लिये
चारा बना रहा है मेरे गाँव का अधेड़ जतनलाल कहार 
(मछलियों की भाषा यदि लिख पाता जतनलाल कहार 
तो आज उसके नाम कोई एक महाकाव्य जरूर होता) 

कोई पूछे मुझसे कि कैसी कविता चाहता हूँ मैं 
तो कहूँगा वह उस काँटे की तरह हो जो धँस जाये 
तुम्हारे कर्णफूलों की जगह और नगीने सी दिपदिप करे 
मछली के काँटे सी बिंध जाये हत्यारे के कण्ठ में और 
लोग कहें कि कविता का काँटा था जिससे मरा हत्यारा 

- नील कमल

Sunday, September 10, 2017

अनुवाद

बांग्ला की साहित्यिक पत्रिका "एवं कथा" के अगस्त 2017 अंक में प्रकाशित कुछ हिंदी कविताओं के बांग्ला अनुवाद । इनमें उदय प्रकाश, विजय गौड़, सुरेश सेन निशान्त, शिरीष कुमार मौर्य, दिनेश कुशवाह, केशव तिवारी, नीलोत्पल, मनोज छाबड़ा, राकेश रोहित और नील कमल की एक-एक कविताएँ हैं । सभी अनुवाद नील कमल के हैं ।

Wednesday, May 17, 2017

दुःख सुख के गीत : सात कविताएँ

दुःख सुख के गीत :

।।एक।।

शुक्ल पक्ष का चाँद
अपनी सम्पूर्ण गोलाई में अँट कर
कसमसा रहा था आकाश में,

गर्म भात के टीले पर
छिलके की भूरी कमीज उतार कर
खिला था मक्खन की रंगत वाला एक
पूरा गोल आलू , थाली में।

।।दो।।

एक हल्दी
खिल रही थी साँवली देह पर,
दूसरी
घुल रही थी दाल में,

पीलापन आँच पर पक रहा था ।

।।तीन।।

सिल के साथ जैसे लोढ़ा
रहे हम एक दूसरे के साथ,

जीवन एक मसाला था
जो पिसता रहा, होता रहा
चिकना, और निखरता रहा।

।।चार।।

समय को गूँथा हमने
आटे की तरह
अपनी हथेली के बीच,

गूँथा समय के आटे को
दुःख के खारे पानी में,
बेला संघर्ष के चाक पर,
सेंका फिर उम्मीद की मद्धम आँच पर,

इस तरह कमाई हमने
अपने हिस्से की रोटी ।

।।पाँच।।

नमक का स्वाद सबसे पहले
बताया आँसुओं ने,

पसीने की बूँदों ने
कहा - 'देखो यहाँ है नमक',

नमक को पाया हमने
दो होठों के अंतराल में
जहाँ ठहरा हुआ था
सात समंदर का पानी ।

।।छह।।

क्या था उन अँगुलियों में
जाती रही देह और मन की यंत्रणा,

उस छुअन को ढूँढ़ता हूँ

क्या मुझे कह देना चाहिए
कि जब विदा ले रहा होऊँ
रूप रस गंध से भरी वसुंधरा से
तब और कुछ हो न हो
आत्मा को स्पर्श करती
तुम्हारी अँगुलियाँ हों पास ।

।।सात।।

बार बार आऊँगा
इसी पृथ्वी पर तुम्हें पाने

बार बार भर लूँगा साँसों में
धनिया की पत्ती से आती गमक को

लहसुन के बघार की
महक के लिए देखूँगा
बार बार रसोई की तरफ

हींग की छौंक वाली
गंध के लिए प्यार करूँगा
उन खुरदुरी हथेलियों को ।
______________________
नील कमल
मो. (0)9433123379

Friday, February 24, 2017

सुंदरबन :कुछ कविताएँ

सुंदरबन : कुछ कविताएँ
(नील कमल)

(१)
यह लाल निशान कैसा
जहाँ ठहर जाती है नज़र
रह जाती है उलझ उलझ कर
जल ही जल इस छोर से उस छोर

तटों पर जड़ की मिट्टी झाड़
खड़े तपस्वी सदृश हरे गाछ
किसने बाँध दिए ये लाल निशान
सबसे ऊँची टहनी पर लपेटा इन्हें

संकरी खाड़ी से निकल
बताता है नाविक रुँधे कण्ठस्वर में
यहाँ आया था एक दिन बाघ और
मार कर खा गया एक मछुआरे को

चेतावनी है लाल निशान
यहाँ से गुजरते हुए महसूस करें इसे
एक भूख शिकार करती है दूसरी का
यह जंगल है, यहाँ के नियम नहीं होते ।

(२)
छत्तों से शहद निचोड़ लाते हैं
मिठास की गहरी पहचान रखने वाले
ये मिठास के बदले खरीदना चाहते हैं
थोड़ा नमक, थोड़ी हल्दी और चावल

घने जंगलों में जाना आना है 
नोना जल के बीच रहने वाले ये लोग
पहचानते हैं बाघों और मगरमच्छों को
होता ही रहता है सामना जिनसे प्रायः

काली नहीं पूजते, दुर्गा नहीं पूजते
नहीं पूजते राम, कृष्ण, शिव, विष्णु
बनबीवी को पूजते हैं, निकल पड़ते हैं
उन इलाकों में जहाँ रहते हैं आदमखोर

हर वक़्त बाघ रहता है लगाए घात
पर ये निकल पड़ते हैं शहद की खोज में
कोई गीत गाते हुए बनबीवी की स्मृति में
रोज ही मौत के दरवाजे पर दस्तक देते हैं ।
(नोना जल = खारा पानी ; बनबीवी = सुंदरबन के जंगलों में पूजी जाने वाली किंवदंती देवी)

(३)
कैसे जले चूल्हा, घर में नहीं सूखा काठ
होगला गाछ की टहनियाँ सूखी जंगल में
जंगल में रहता बाघ आदमखोर खूँखार

कैसे पके भात, नहीं अन्न का दाना एक
महाजन के गोदाम में चावल के बोरे सारे
लकड़ियाँ बिकेंगी तभी चढ़ेगी हाँड़ी भात की

नोना जल में माछ, तट पर सोया घड़ियाल है
पाँव धँसे दलदल में, देखो जीवन का ये हाल है ।
(होगला = एक वृक्ष का स्थानीय नाम)

(४)
हेतल वन में रहती है मौत
कि रहता बाघ आदमखोर हेतल वन में
जाना उधर तो चौकन्ना रहना मेरे बच्चों
घात लगाए बैठा होगा छुपकर वहीं कहीं

लग चुका हो खून जिसके मुँह में
उस बाघ का करना तुम शिकार मिल कर
अकेले मत जाना हेतल वन में भूल कर भी ।
(हेतल = सुंदरबन क्षेत्र में पाया जाना वाला एक पेड़)

(५)
तितली अपने पंखों पर उठा ले पहाड़
तो उड़ती हुई दिखेगी बिलकुल ऐसी ही
अभी जैसी दिखती है यह डोंगी, खुली है
जो गोसाबा से लादे द्वीप के अनगिन मानुष ।
(गोसाबा = सुंदरबन के एक द्वीप का नाम)

(६)
जड़ें भी साँस लेती हैं यहाँ
ज़मीन से निकल आती हैं बाहर
हाथ उठाये हों बच्चों ने ज्यों अपनी कक्षा में

ये छरहरे गाछ जो दिखते हैं
मानिनी नायिका से खड़े इन इलाकों में
इनसे ही पाया नाम इस जंगल ने सुंदरबन
ये सुंदरी के गाछ, पंकिल भूमि में ज्यों खिले कँवल ।
(सुंदरी = एक पेड़ का नाम)

(७)
सरकार की चिंता यह नहीं
कितने आदमी मर गए बेमौत

सरकार नहीं जानना चाहती
कितने बच्चों को उठा ले गए बाघ

यह बाघों का अभयारण्य
सरकार की चिंता यहाँ केवल
बाघों को बचाने को लेकर है, और कुछ नहीं ।

(८)
मोहाने पर खड़ी है नाव
ढलते सूर्य का तेज उतर रहा है
दृश्य ऐसा बन रहा है इस वक़्त कि
पानी में अर्घ्य देता हो कोई आकाश से
तरल बिलकुल तरल सोने की धार गिरती
मोहाने पर जहाँ, थाह नहीं मिलता पानी का
एक सोने की तलवार घोंपी हुई दिखती पानी की छाती में ।

(९)
इस खाड़ी प्रदेश में
पहाड़ की नदियाँ खो देती हैं अपनी मिठास
एक खारेपन में घुलने लगता है वजूद उनका
इसके घावों से नमक का रिश्ता बहुत पुराना है
दारुण दुःख की अंतहीन एक गाथा है सुंदरबन ।

(१०)
क्या जानो तुम
उस आदमी का दुःख
महज थोड़े से साग और कुछ
मछलियों के सहारे लड़ता रहा जो अपनी भूख से
तुम्हारे लिए यह दो दिन एक रात का पैकेज टूर है ।

★★    ★★    ★★

नील कमल

मेल : neel.kamal1710@gmail.com
मोबाइल नंबर : 9433123379.

Thursday, January 5, 2017

बीता साल साथ चला आता था..

दिसम्बर की धूल लगी
वही घिसी और पुरानी जींस पहने
मैं चला आया था जनवरी के महीने में

जेबों में अब भी कहीं
पड़ा था बीते अक्टूबर का सूखा एक फूल
अब भी गीली थी मेरी
वह नीली कमीज जुलाई की बौछारों से

मेरी रुमाल में अब भी सहमा
पड़ा था मई की धूप का गर्म एक टुकड़ा
यादें भी पिछले मार्च की
चुभती थीं रह रह कर हवा जब भी चलती

यह किस नये साल में आ गया था मैं
जिसमें पूरा का पूरा बीता साल साथ चला आता था ।

- नील कमल