Friday, February 24, 2017

सुंदरबन :कुछ कविताएँ

सुंदरबन : कुछ कविताएँ
(नील कमल)

(१)
यह लाल निशान कैसा
जहाँ ठहर जाती है नज़र
रह जाती है उलझ उलझ कर
जल ही जल इस छोर से उस छोर

तटों पर जड़ की मिट्टी झाड़
खड़े तपस्वी सदृश हरे गाछ
किसने बाँध दिए ये लाल निशान
सबसे ऊँची टहनी पर लपेटा इन्हें

संकरी खाड़ी से निकल
बताता है नाविक रुँधे कण्ठस्वर में
यहाँ आया था एक दिन बाघ और
मार कर खा गया एक मछुआरे को

चेतावनी है लाल निशान
यहाँ से गुजरते हुए महसूस करें इसे
एक भूख शिकार करती है दूसरी का
यह जंगल है, यहाँ के नियम नहीं होते ।

(२)
छत्तों से शहद निचोड़ लाते हैं
मिठास की गहरी पहचान रखने वाले
ये मिठास के बदले खरीदना चाहते हैं
थोड़ा नमक, थोड़ी हल्दी और चावल

घने जंगलों में जाना आना है 
नोना जल के बीच रहने वाले ये लोग
पहचानते हैं बाघों और मगरमच्छों को
होता ही रहता है सामना जिनसे प्रायः

काली नहीं पूजते, दुर्गा नहीं पूजते
नहीं पूजते राम, कृष्ण, शिव, विष्णु
बनबीवी को पूजते हैं, निकल पड़ते हैं
उन इलाकों में जहाँ रहते हैं आदमखोर

हर वक़्त बाघ रहता है लगाए घात
पर ये निकल पड़ते हैं शहद की खोज में
कोई गीत गाते हुए बनबीवी की स्मृति में
रोज ही मौत के दरवाजे पर दस्तक देते हैं ।
(नोना जल = खारा पानी ; बनबीवी = सुंदरबन के जंगलों में पूजी जाने वाली किंवदंती देवी)

(३)
कैसे जले चूल्हा, घर में नहीं सूखा काठ
होगला गाछ की टहनियाँ सूखी जंगल में
जंगल में रहता बाघ आदमखोर खूँखार

कैसे पके भात, नहीं अन्न का दाना एक
महाजन के गोदाम में चावल के बोरे सारे
लकड़ियाँ बिकेंगी तभी चढ़ेगी हाँड़ी भात की

नोना जल में माछ, तट पर सोया घड़ियाल है
पाँव धँसे दलदल में, देखो जीवन का ये हाल है ।
(होगला = एक वृक्ष का स्थानीय नाम)

(४)
हेतल वन में रहती है मौत
कि रहता बाघ आदमखोर हेतल वन में
जाना उधर तो चौकन्ना रहना मेरे बच्चों
घात लगाए बैठा होगा छुपकर वहीं कहीं

लग चुका हो खून जिसके मुँह में
उस बाघ का करना तुम शिकार मिल कर
अकेले मत जाना हेतल वन में भूल कर भी ।
(हेतल = सुंदरबन क्षेत्र में पाया जाना वाला एक पेड़)

(५)
तितली अपने पंखों पर उठा ले पहाड़
तो उड़ती हुई दिखेगी बिलकुल ऐसी ही
अभी जैसी दिखती है यह डोंगी, खुली है
जो गोसाबा से लादे द्वीप के अनगिन मानुष ।
(गोसाबा = सुंदरबन के एक द्वीप का नाम)

(६)
जड़ें भी साँस लेती हैं यहाँ
ज़मीन से निकल आती हैं बाहर
हाथ उठाये हों बच्चों ने ज्यों अपनी कक्षा में

ये छरहरे गाछ जो दिखते हैं
मानिनी नायिका से खड़े इन इलाकों में
इनसे ही पाया नाम इस जंगल ने सुंदरबन
ये सुंदरी के गाछ, पंकिल भूमि में ज्यों खिले कँवल ।
(सुंदरी = एक पेड़ का नाम)

(७)
सरकार की चिंता यह नहीं
कितने आदमी मर गए बेमौत

सरकार नहीं जानना चाहती
कितने बच्चों को उठा ले गए बाघ

यह बाघों का अभयारण्य
सरकार की चिंता यहाँ केवल
बाघों को बचाने को लेकर है, और कुछ नहीं ।

(८)
मोहाने पर खड़ी है नाव
ढलते सूर्य का तेज उतर रहा है
दृश्य ऐसा बन रहा है इस वक़्त कि
पानी में अर्घ्य देता हो कोई आकाश से
तरल बिलकुल तरल सोने की धार गिरती
मोहाने पर जहाँ, थाह नहीं मिलता पानी का
एक सोने की तलवार घोंपी हुई दिखती पानी की छाती में ।

(९)
इस खाड़ी प्रदेश में
पहाड़ की नदियाँ खो देती हैं अपनी मिठास
एक खारेपन में घुलने लगता है वजूद उनका
इसके घावों से नमक का रिश्ता बहुत पुराना है
दारुण दुःख की अंतहीन एक गाथा है सुंदरबन ।

(१०)
क्या जानो तुम
उस आदमी का दुःख
महज थोड़े से साग और कुछ
मछलियों के सहारे लड़ता रहा जो अपनी भूख से
तुम्हारे लिए यह दो दिन एक रात का पैकेज टूर है ।

★★    ★★    ★★

नील कमल

मेल : neel.kamal1710@gmail.com
मोबाइल नंबर : 9433123379.

Thursday, January 5, 2017

बीता साल साथ चला आता था..

दिसम्बर की धूल लगी
वही घिसी और पुरानी जींस पहने
मैं चला आया था जनवरी के महीने में

जेबों में अब भी कहीं
पड़ा था बीते अक्टूबर का सूखा एक फूल
अब भी गीली थी मेरी
वह नीली कमीज जुलाई की बौछारों से

मेरी रुमाल में अब भी सहमा
पड़ा था मई की धूप का गर्म एक टुकड़ा
यादें भी पिछले मार्च की
चुभती थीं रह रह कर हवा जब भी चलती

यह किस नये साल में आ गया था मैं
जिसमें पूरा का पूरा बीता साल साथ चला आता था ।

- नील कमल


Monday, April 18, 2016

दो कविताएँ

एक : पतंग
__________

प्रार्थनाएँ सारी
स्थिगित रहेंगी इस समय

स्थगित रहेंगी सारी इच्छाएँ
विराम देने का मन है इसी क्षण
अब तक जारी सारी लड़ाइयों को

इस समय एक लड़की
उड़ा रही है पतंग पूरे उल्लास से
आसमान में इतरा रही है पतंग

हरी कमीज पर पीला
दुपट्टा ओढ़े इस लड़की का नाम
चुमकी, झिलिक, शगुफ़्ता या पारमिता
इनमें से कुछ भी हो, क्या फ़र्क पड़ता है,

नंगे पाँव थिरकती है
लड़की, जिसका हौसला
इस समय सातवें आसमान पर है,
 
पतंग गुदगुदा रही है आसमान को
ठीक उस जगह जहाँ ज़रा सा छू दे
तो खिलखिला कर हँसती है आत्मा

ये लड़की के फुरसत के लम्हे हैं
माँ का कहा हर काम निबटा कर
अपने स्कूल के बस्ते से बेखबर
वह कर रही है बातें आसमान से

आसमान की गुदगुदी उतरती है
डोर के सहारे अब नीचे की ओर
धीरे धीरे फैल जाती है होठों पर

धूप का सबसे चमकीला टुकड़ा
अब खिलता है उसकी आँखों में

ओ रे चुमकी
सुन ओ झिलिक
अरी ओ शगुफ़्ता
हाँ रे पारमिता सुन
तेरी डोर से जोड़ रहा हूँ साँसें
धरती का सारा शीशा पीस कर
आ मल दूँ इन धागों पर, तब तक
स्थगित रहें सारी प्रार्थनाएँ, सारी
इच्छाएँ और सारी जरुरी लड़ाइयाँ ।

_____________________________

दो : नृत्य
________

।।नृत्य - एक।।

नृत्य का तय अर्थ है
अर्थ है इसीलिए तय
व्याकरण भी है नृत्य का

यह नर्तकी इसलिए
नहीं कर रही है नृत्य
कि यह बसन्त का समय है

किसी भी मौसम में
यह नाचती है इसी तरह
नाचना इसके लिए लड़ने जैसा है ।

।।नृत्य - दो।।

नाचना एक काम भी हो सकता है
जैसे पत्थर तोड़ना, जैसे कुँए खोदना
जैसे नहरें निकालना, जैसे सुरंगें बनाना

जरुरी नहीं कि जो नाच रहा है
वह खुशी-ख़ुशी और उमग कर नाचता हो

नाचना एक काम भी हो सकता है ।

।।नृत्य - तीन।।

उसने देख लिए हैं
रंग ढेर सारे
यह उसके नाचने का समय है

उसे मिल गया है
फूलों का ठिकाना
यह उसके नाचने का समय है

उसे लूटना है
ढेर सारा पराग
यह उसके नाचने का समय है ।

।।नृत्य - चार।।

वे नाच रही हैं
और नाचते हुए
हवा पर लिख रही हैं
पैगाम अपने दोस्तों के लिए

एक आदिम भाषा की
लिपि उभर रही है हवा में
और विस्मय के साथ पढ़ी जा रही है

शायद यह सृष्टि की
पहली ही कोरियोग्राफी है
जिसके बारे में स्वर्ग की अप्सराओं
से भी पहले पता था मधुमक्खियों* को ।

(मधुमक्खियों का विशेष नृत्य, 'वैगल डांस')

- नील कमल

।। इंद्रप्रस्थ भारती, जनवरी-मार्च 2016 अंक में प्रकाशित ।।

Saturday, November 10, 2012

दीपंकर राय की कविता -" दाखिल"

दीपंकर राय बांग्ला कविता में एक भिन्न भाव-बोध और भाषा-भंगिमा के कवि हैं । देश-भाग का दंश जीने वाली बांग्ला की कविता पीढ़ी में दीपंकर राय का नाम भी शुमार किया जाता है । वे बार-बार अपनी जड़ों की ओर लौटते हैं । हां , इसके लिए अब पासपोर्ट और वीसा की ज़रूरत पड़ती है । तत्कालीन पूर्वी बंगाल से विस्थापित होने की पीड़ा इस कवि के लेखन में बरबस झलकती है । यहां प्रस्तुत "दाखिल" शीर्षक कविता कवि के संकलन "मत्स्यकुमारीर जोछना" से है ।





दाखिल..


महसूस कर सकता हूं

कि दाखिल हो चुका हूं


ज़रा ज़रा सा दाखिल होते हुए

महसूस उसे भी तो होता होगा


चांद को भी महसूस होता है

दाखिल होते हुए , आसमान का बदलना

बादलों को भी महसूस होता है कि आसमान

वही नहीं रहा जो कि वह था

तट पर उतरते हुए , शायद वह

सोचता समझता है "इस नदी" के विषय में -


क्या पानी को भी होता है महसूस ?

ऐसा जीवन  पाकर भी क्यों वह

बोल नहीं पाता , "कैसा हूं" -


सवालों जवाबों के परे जहां

कुदरत महज हवा में

हवा ही जहां कुदरत मेरे लिए

एक जलती हुई सिगरेट ..

आंखों के इर्द गिर्द तांबई रंग पूछता है


क्यों नही जी लेता मैं ये पल खुशी के ।

(अनुवाद : नील कमल )

 

Thursday, August 16, 2012

कितना बड़ा है स्त्री की देह का भू-गोल


कितना बड़ा है
स्त्री की देह का भू-गोल
क्या इतनी बड़ी
है स्त्री की देह कि
जिसपर पैदल यात्रा शुरु करे
अलसुबह कोई पवित्र विचार
किसी एक छोर से तो पहुंच ही न पाए
उसके दूसरे छोर तक और शाम हो जाए


कितने पहाड़ हैं
इस भू-भाग पर
कितने पठार
कितनी नदियां
कितने रेगिस्तान


कितनी बारिश होती है यहां
कितने फूल खिलते हैं इस इलाके में


क्या मापा गया
कभी किसी यंत्र से
तापमान इसका
आर्द्रता इसकी


कितनी ऋतुएं
कितनी वनस्पतियां
कितने पशु-पक्षी
पाए जाते हैं यहां


क्या देखा किसी ने
आपदाओं को टूटते
इसकी छाती पर
गिने गए क्या
किसी युग में
क्षत के निशान
इसकी देह पर


कवि-गण रहे रीझते
पृथ्वी के ऊंचाइयों वाले उभारों पर
गहराइयों में रहे तैरते डूबते
अलक्षित रहा कवि की आंख से
समतल इस भू-भाग का जहां
नदियां जुटाती रहीं मिट्टी युगों से चुपचाप
यह क्षेत्र किसी स्त्री की पीठ सा दिखता है


हे पुरातत्ववेत्ताओं !
क्या किसी खुदाई में मिले
आंसुओं के मोती फॉसिल बने हुए


हे वनस्पति-शस्त्रियों !
बताओ क्या किसी जंगल में मिला
कोई फूल कभी न मुरझाने वाला


हे काव्य-रसिकों !
बताओ क्या पढ़ी है कहीं
कविता कोई स्त्री के पेट पर


हे कविता के व्यापारियों !
बताओ लिखी क्यों नहीं गई कोई महान कविता
अब तक उसकी एड़ियों की फटी बिवाइयों पर
क्यों नहीं है कोई याद रखने लायक कविता
हमारी भाषा में उसकी हथेलियों पर उग आए
काले कठोर घट्ठों पर ।

Sunday, June 3, 2012

समकालीनता के बारे में..



कैसे हो कवि
कविता-फ़विता तो खैर
कर लेते हो ठीक ठाक



छप-छपा जाते हो इधर-उधर
अदीब कोई, गाहे बगाहे, लिख भी देता है
तुम्हारी तारीफ़ में , तो क्या इतने से
बचा रहेगा रसूख शाइरी का ?


कभी फ़ोन-फ़ान भी कर लिया करो अमुक सिंह को
तमुक त्रिपाठी से जारी रखो खतो-किताबत
फ़लाँ श्रीवास्तव के शहर भी चले जाया करो
कभी घूमते-घामते , ढेकाँ पाण्डेय जी का जन्म दिन
भी रखा करो याद , अदब के मुख्तलिफ़ रिसालों में
इन सबकी है बड़ी साख , सुनते हैं ।
 

कवि , बड़ी कायर किस्म की है
तुम्हारी सोच समकालीनता के बारे में
बहादुर तुम्हारे समकालीन कैसे खुजला रहे हैं
एक दूसरे की पीठ , देखो , सभ्यता की उस
दीवार के पीछे , बौने भी यहाँ छू लेते हैं आकाश
 

विकल्प दो ही हैं, कवि, दो ही नुस्खे होते हैं
मुश्किल हालात में  
सफ़ल होने के -


किसी की पीठ पर चढ़ कर
छूना होता है आकाश ,
या फ़िर , आत्मनिर्वासन में जीते हुए
होना होता है "उदै परकाश"

 

Saturday, February 4, 2012

ओ मेरी शापित कविताओं



बदचलन हो गये हैं शब्द
बदल दिये हैं सुलूक उन्होंने
कविता में


अब लिखता हूँ प्रेम तो
नहीं खिलता है कोई एक फूल
बस एक गागर रीती सी
डूबती जाती है
हृदय की गहराइयों से
डुब डुब डुबुक डुबुक
की आवाज़ें आती हैं


घृणा लिखते ही कागज पर
नहीं छिटकती हैं लुत्तियाँ
दुख लिखने पर नम नहीं होता
कठिन करेज कोई पहले जैसा


सियाही आँसुओं की हो या
रोशनाई हो लहू सी
इबारतें अब नहीं खिलती हैं
अँधेरे में जुगनुओं की तरह


इन शब्दों का क्या करूँ मैं
जो मेरे आस पास पसरे रहते हैं
सहवास के बाद की निर्लिप्तता में
निस्पन्द ठण्डे जिस्म हों जैसे


आखिर कब टूटेगा कविता का तिलिस्म
आखिर कब लिखी जायेगी वह कविता
जिसके शब्द बोलते होंगे
कि जैसे पान खाये होठों से
बोलती है सुर्ख़ी


ओ मेरी शापित कविताओं
तुम्हारी मुक्ति के लिये , लो
बुदबुदा रहा हूँ वह मन्त्र
जिसे अपने अन्तिम हथियार
की तरह बचा रखा था मैंने


तुम्हें ही वरण करने थे
मेरे कवच और कुण्डल
मुझे काम आना था इसी तरह
कुछ शब्दों को अर्थ सौंपते हुए !


(नील कमल)

अरूप घोष की पेंटिंग - गूगल के सौजन्य से