Friday, December 2, 2011

कवि शंख घोष की कविताएँ

कवि शंख घोष की कविताएँ
(मूल बांग्ला से अनुवाद - नील कमल)


१. यौवन


दिन और रात के बीच
परछाइयाँ चिड़ियों के उड़ान की
याद आती हैं यूँ भी
हमारी आखिरी मुलाकातें ।


२. तुम


उड़ता हूँ और भटकता हूँ
दिन भर पथ में ही सुलगता हूँ
पर अच्छा नहीं लगता है जब तक
लौट कर देख न लूँ कि तुम हो , तुम ।


३. अखबार


रोज सुबह के अखबार में
एक शब्द बर्बरता
अपने सनातन अभिधा का
नित नया विस्तार ढूँढता है ।


४. सपना


ओ पृथ्वी
अब भी क्यों नहीं टूटती है मेरी नींद


सपनों के भीतर ऊँचे पहाड़ों की तहों से
झरती हैं पंखुरियाँ


झरती हैं पंखुरियाँ पहाड़ों से
और इसी बीच जाग उठते हैं धान के खेत


जब लक्ष्मी घर आयेगी
घर आयेगी जब लक्ष्मी


वे आयेंगे अपनी बन्दूकें और
कृपाण लिए हाथों में , ओ पृथ्वी


अब भी क्यों नहीं टूटती है मेरी नींद ।


५. नीग्रो दोस्त के नाम एक ख़त


रिचर्ड रिचर्ड
रिचर्ड तुम्हारा नाम मेरे लफ़्ज़ों में है ।
कौन रिचर्ड ?
कोई नहीं ।
रिचर्ड मेरा लफ़्ज़ नहीं है ।


रिचर्ड रिचर्ड
रिचर्ड तुम्हारा नाम मेरे सपनों में है ।
कौन रिचर्ड ?
कोई नहीं ।
रिचर्ड मेरा सपना नहीं है ।


रिचर्ड रिचर्ड
रिचर्ड तुम्हारा नाम मेरे दुख में है ।
कौन रिचर्ड ?
कोई नहीं ।
रिचर्ड मेरा दुख नहीं है ।
 
६. नशा

अभी और नशा तारी होने दे उसपर
वरना इस जहान को बर्दाश्त नहीं कर पायेगा वह

कि अब भी जवान है वह, ऐ ख़ुदा,
तो फिर उसे उम्रदराज कर दे, वरना ये जहान उसे
बर्दाश्त नहीं कर पायेगा ।

७. चाबी

फर्जी है, फर्जी है हस्ताक्षर मेरा,
मेरा फर्जी हस्ताक्षर करने वाले चोर को
पकड़ा जब, वह मुड़ा मेरी तरफ,

देखा मैंने
अरे, वह मैं ही था
मैंने ही दुस्साहस से भर
अपने ही हस्ताक्षर की नकल की
मैंने ही इस तरह बनाई, अपनी बर्बादी के
ताले की नकली चाबी ।

८. सूखा

नदी नाले पोखर सब सूखे

पत्रहीन गाछ, जो
आये थे भरने पानी
सामने झिलमिल पसरी है रेत

यही नहीं है अंत
अभी तो शुरुआत भर है
वे ले जायेंगे अब रेत सारी

दुनिया इस तरह खाली खाली
इससे पहले कभी नहीं लगी थी ।

९. होना

हुआ तो ठीक,
न हुआ तो भी ठीक
जीवन को यूँ ही तुम देखो
और बाद इसके कुछ सीखो

पथ पर बैठी
उस नग्न भिखारिन की
दो आँखों के धीमे प्रतिवाद में
है, यह सब भी है ।

१०. मुर्दाबाद

बोलना चाहता हूँ, मुर्दाबाद
बिलकुल अभी बोलना चाहता हूँ , खामोश

तथापि बोल नहीं पाता
और इसीलिए खुद को नोंचता हूँ रोज-ब-रोज

बोलना चाहता हूँ कि जानता हूँ
तुम्हारा इरादा मेरी मज्जा के भीतर
चक्करदार घूमते रहने का है गोल गोल

बोलना चाहता हूँ
कि तुम अनादि अनंत
चक्षु स्नायुहीन तुम, महज पानी
महज नमक तुम, जर्द-जर्द से तुम

बस एक पराग, एक आवर्तन
तुम एक पतंग, एक गह्वर तुम

बोलना चाहता हूँ, मुर्दाबाद
मिट जाओ, टूट जाओ, पर बोल नहीं पाता

तुम खुद ही अपने हाथों
मिटा देते हो मेरे वजूद को, मेरी आत्मा को ।

११. डर

उसकी छाती के पास
चमचमाती एक कटोरी इनेमल वाली
अपने हाथ फैलाये बेसुध सो गई है मेरी बच्ची
सी. आई. टी. रोड के एक मोड़ पर, उन पत्थरों के
टीले के ठीक ऊपर ।

आज दिन भर हुई बारिश उसकी भिक्षा पर
समझना कठिन कि कौन सा पानी और आँसू कौन सा
वह खो गई जब एक दिन बंद गली के घुमावदार मोड़ पर
रो पड़ी तब फफक कर जैसे अनाथ बच्चियाँ रोती हैं अक्सर

कहा उसे मैंने
कि डर किस बात का
मैं जो खड़ा था तुम्हारे पीछे

लेकिन सच कहूँ तो
डर मुझे भी लगता है
जब वह सो जाती है और
उसके होठों के कोर पर उतर आता है
बादलों को चीर कर एक टुकड़ा रौशनी का ।


१२. ढक जाता है चेहरा इश्तहारों से

खड़ा हूँ तुम्हारे लिए
अकेला, गली के एक कोने में
सोचता हूँ दिखलाऊँ अपना चेहरा
ढक जाता है चेहरा इश्तहारों से ।

दो एक आसान सी बातें
सोचता हूँ कि कहूँ पलकों की ओट से
जलती-बुझती हैं तभी फुलझड़ियाँ इश्तहारों में ।

कितना मुश्किल है जानना
कौन देखता है किसको किस नज़र से
हाय रे मेरा शब्द-विलास, हाय रे मेरे देश ।

बिकी हुई निगाहें तुमसे ओत प्रोत
बिकाऊ नियॉन की रौशनी में जो कुछ भी
है आज व्यक्तिगत ।

मुँह की बात अकेली
पड़ी रही गली के एक कोने में
एक थका हुआ मुखौटा मेरा लटकता रहा
इश्तहारों में ।


 

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