Wednesday, June 8, 2011

इतना भी न हुआ..




इतना भी न हुआ.. (एक कविता श्रृंखला)


१. जीने की तरह जीना,
मरने की तरह मरना
इतना भी न हुआ
कि बोलूं तो सुना जाऊं दूर तक
चलूं तो पथ में न आएं बाधाएं
गाऊं अपनी पसन्द के गीत कभी भी
बनाऊं कहीं भी सपनों का नीड़
इतना भी न हुआ.. न हुआ इतना भी
कि विश्वास के बदले पाऊं विश्वास
श्रम के बदले रोटी-पानी ।


२.गहराती रात जैसी नींद से निकल
पलकों की पीठ पर
सपनों की गठरी लिए
चल पड़ूं उछलता-कूदता
न हुआ इतना भी, इतना भी न हुआ
बांझ कोख सी उदासी में
डूबी है दुनिया
जिसकी बेहतरी की उम्मीद में
जागती आंखें झुकी रहती हैं
क्षमा-प्रार्थना की मुद्रा में इन दिनों
होठों से धीमे- धीमे
निकलता है स्वर,
क्षमा ! क्षमा ! बस क्षमा !! कहते हैं हम एक-दूसरे से ।


३.क्षमा हे पितरों
तार नहीं सके हम तुम्हें
मुक्त न कर सके तुमको
आवागमन के दुश्चक्र से
कुन्द पड़ चुके हमारे इरादे
कौंधते और बुझते रहे अंधेरों में
हमारी स्मृतियों की गंगा में
आज भी तैरते हैं शव तुम्हारे
जिन्हें खींच कर तट पर लाएं
यह साहस हम जुटा ही नहीं पाए ।
क्षमा हे पृथ्वी
जल पावक गगन समीर
तुम्हारी विस्फोटक रोशनी में
चमक न सके हम कुन्दन बन
कात न सके चदरिया झीनी,
मिठास बिना ही ज़िन्दगी जीनी
नागवार हमें भी गुजरती थी  


४.क्या करें, कि एक शीर्षक-हीन कविता थे हम
पढ़े जा सकते थे बिना ओर-छोर
कहीं से भी, बीच में छोड़े जा सकते थे हम,
 ज़िल्दों में बन्द, कुछ शब्द, हमें पता नहीं था
आलोचकों की भूमिका के बारे में
जैसे पता नहीं था पितरों को
मुक्ति का खुफ़िया रास्ता ।
एक शब्द चमक सकता था
अंधेरे में जुगनू बन
एक शब्द कहीं धमाके के साथ
फट सकता था
सोई चेतना के ऊसर में
एक शब्द को लोहे में
बदल सकते थे हम
धारदार बना सकते थे उसे
हमसे नहीं हुआ इतना भी, इतना भी न हुआ


५.क्षमा ! हे शब्द-ब्रह्म, क्षमा !!
बहुत पीछे छूट चुका बचपन
ठिठका खड़ा है
अन्धे कुंए की ओट पर
विस्फ़ारित मुंह उस कुंए के
एक अधर पर धरे पांव
अड़ा है, कहां है सुरसा मुंह कुंए का
दूसरा अधर
शून्य में उठा दूसरा पांव
आकाश में लटका पड़ा है ।
समय की तेज रफ़्तार सड़क पर
कई प्रकाश वर्ष पीछे
ठिठका खड़ा बचपन
भींगता है अदद एक
बरसाती घोंघे के बिना
गल जाती हैं किताबें
स्कूल जाने के रास्ते में
खेत की डांड़ पर
भींग जाता है किताबों का बेठन,
 किताबों से प्रिय थे जिसे
इमली बेर आम चिलबिल
और रेडियो पर बजता विविध-भारती
उस बचपन से क्षमा,
कि हम अपराधी उस बचपन के
कुंए की तरह खड़े रहे हम
उसके रास्ते में
बिछ सकें नर्म घास की तरह
उभर सकें पांवों तले
ज़मीन की तरह
न हुआ इतना भी, इतना भी न हुआ.. ।
 
 
 
 
 

Friday, April 22, 2011

पेड़ पर आधा अमरूद






एक सुन्दर कविता की तरह
वह लटका है
पेड़ की कमसिन शाख पर

आते-जाते रहते हैं
फलों के आलोचक
कभी सुग्गे की तरह
तो कभी गौरैया की तरह

मुझे इतना पता है
कि परिन्दे जब आते हैं
पेड़ों पर, अपनी नुकीली ठोर से
कुरेदते हैं जब किसी
मीठे फल की पीठ,
 तो उनके इस सुलूक में
उनके विवेक की भूमिका
उतनी नहीं होती
जितनी कि उनकी भूख की
हो सकती है

और, इतना तो आप भी
देख ही रहे होंगे
कि पेड़ पर कुछ अमरूद हैं
आधे खाए-जा-चुके

यह पूस का महीना है
एक फलते-फूलते मौसम में
यह कविता के अमरूद होने का समय है

Thursday, March 31, 2011

एक दिन आऊंगा




 एक दिन आऊंगा

खटखटाऊंगा तुम्हारा दरवाज़ा
मुझसे पीछा छुड़ाने की कोशिश में
तुम पूछोगे मेरे आने का मकसद
विरक्ति में डूबी आंखों से ।


उस दिन धीरे से चुपचाप
थमा जाऊंगा तुम्हें
जो कुछ भी होगा
मेरी झोली में ।


वह अगरबत्ती का एक
पैकेट भी हो सकता है
या फिर आधी-जली
मोमबत्ती का टुकड़ा, कोई मुरझाया सा फूल
या पुरानी ज़िल्द वाली
कोई किताब ।


कुछ नहीं पूछोगे तुम मुझसे
अगरबत्ती के बारे में, कि वह
जलेगी तो कमरों में कितनी
देर तक रहेगी सन्दल की ख़ुशबू
या कितनी दूर तलक जाएगी
मोगरे की गन्ध ।


मुझे यह भी बताने की
जरूरत नहीं होगी बाकी
कि मोमबत्ती के भीतर की
सुतली के जलने के दरम्यान
कितनी मोम पिघल कर
फैल गई है हमारे एकान्त में
या फिर कालिख की तरह
जम गई है हमारी सांसों में ।


और ताज्जुब तो यह कि
तुम जानना भी नहीं चाहोगे
कैसे मुरझा जाते हैं फूल दबे-दबे
किताबों के भीतर, और फैल जाता है
एक हाहाकार शब्दार्थों के बाहर की दुनिया में ।


उस दिन, न तो पूछ ही सकोगे तुम
न ही बता सकूंगा मैं
एक किताब की ज़िल्द के
पुराने होते जाने की इतिकथा, उस दिन, अभिव्यक्ति पाए बिना ही उठेंगी
कुछ कविताएं , भाप बन कर , पुरानी ज़िल्द वाली किताब से
और फुसफुसाती हुई कानों में
बताएंगी मेरे आने का मकसद ।


मुझसे पीछा छुड़ाना
नहीं होगा इतना आसान
कि मेरे पास होंगी कुछ
मामूली चीजें, मसलन एक अगरबत्ती का पैकेट
एक आधी-जली हुई मोमबत्ती
एक मुरझाया-सा फूल , या
पुरानी ज़िल्द वाली एक किताब ।


चुपचाप थाम लोगे तुम कोई एक
मामूली सी चीज मेरे हाथों से
और मैं लौटूंगा अपनी झोली में
सहेज कर कोई बहुत पुराना ख़त
जिसे तुमने संभालकर रखा होगा
मेरे लिये स्मृतियों के सन्दूक में ।


उस दिन, आंखों में झिलमिलाते
तरल सन्धिपत्रों पर होंगे हमारे
अमिट हस्ताक्षर ।


कैसा यह देना-लेना साथी, कैसा नक़द - उधार
कैसा अद्भुत यह जीवन व्यापार ।

Monday, February 21, 2011

बांग्ला-कवि विनय मजुमदार


बांग्ला के विलक्षण कवि विनय मजुमदार के यहां प्रेम कोई आध्यात्मिक वस्तु भले ही न हो किन्तु वह पवित्र अवश्य है- प्रकृति की तरह, फूलों,झरनों,पहाड़ों और नदियों की तरह। यह अस्थि-मज्जा से युक्त, रक्त-मांस से भरपूर स्पन्दित प्रेम है। कवि की ही तरह उसकी काव्य-भाषा भी विलक्षण है। प्रस्तुत है कवि की कुछ कविताओं के हिन्दी अनुवाद, जो उनकी प्रतिनिधि कविताओं के संकलन से चयनित हैं:
 (मूल बांग्ला से सभी अनुवाद- नील कमल) ।




 

१.अकाल्पनिक 
 
तुम्हारे भीतर आऊंगा, हे नगरी,
कभी-कभी चुपचाप
बसन्त में कभी, कभी बरसात में
जब दबे हुए ईर्श्या-द्वेष
पराजित होंगे इस क़लम के आगे
तब, जैसा कि तुमने चाहा था,
एक सोने का हार भी लाऊंगा उपहार।
तुम्हारा सर्वांग ज्यों इश्तहार
यौवन के बाज़ार का, फिर भी तुम्हारे पास आकर
महसूस होता है, जैसे तुम्हारी अपनी
एक तहज़ीब है, सिर्फ़ तुम्हारी,
और जो आदमी के भीतर की
चिरन्तन वृत्ति का प्रकाश भी है।
हे नगरी, महज कुछ-एक बार तुम्हारे भीतर आना
यह एहसास देता है कि जैसे तीनों-लोक में
नहीं कोई भी तुम्हारे जैसा,
 तुम्हारा नशा, तुम्हारी देह, तुम्हारी बातें,
 और तुम्हारा स्वाद है ऐसा।   
 

२. दे सकता  हूँ  प्यार 

 दे सकता हूं प्यार, मगर
क्या ले पाओगे ?
जादुई तुम्हारी इन अंगुलियों से
झर जाते हैं हंसी, ज्योत्सना, स्मृतियां और दर्द सभी।
मेरी अपनी समझ है
कि चांदनी रातों में
नहीं उड़ा करते प्यारे कबूतर,
 फिर भी दे सकता हूं प्यार ।
शाश्वत, सहजतम है यह दान,
 कि अंकुर फूटें अपने उद्गम से निर्बाध,
और पिसते अंधेरों मे ज़र्द हुए बग़ैर
पा जाएं अपनी हरियाली ।
इस सहजता के बावज़ूद
बड़े दर्द के साथ रखता हूं
अपनी ही मौत की नींव,
कि प्यार न कर बैठूं किसी को ।
संभाल नहीं पाओगे प्यार, कबूतरों,
उड़ जाओगे, पेड़ की अधिकतम ऊंचाई से
गिर कर भी आघात नहीं पाओगे,
 प्राचीन चित्रों की चिरस्थायी हंसी के साथ
चले जाओगे, जख्मी, दर्द में डूबा, स्तब्ध छोड़ जाओगे मुझे।   


 ३. जादुई  फूल 

 जादुई फूल, वह मेरा आविष्कृत प्रेम,
लेमनचूस की तरह, बहुत देर तक, निगले बिना
जिसका रसास्वादन
करता हुआ, तृप्त मैं, भूल जाता हूं
अपनी लम्बी प्यासों को ।
बहुत सोचता रहता हूं
असंख्य खरोंचें लिए अपनी आत्मा पर
टूट कर बिखरना, क्या होता है , जानता हूं
नीले आसमान सा हृदय किसे कहते हैं,
और यह कि, निर्विकार उस चिड़िया का नाम
क्या है, जानता हूं ।
एक पतंग अपने धवल पंख खोल
उड़ता है, एक जवान अपनी आत्मा पर
उसकी सांसों को महसूस करता है ।
बीमार-मन मुग्ध होकर देखता हूं
खिड़कियों पर टपकती है लार
आसमान से, हवाओं में घुलती हुई ।
मुग्ध मैं, उड़ती हुई तुम - लौट आओ,
लौट आओ, प्रिय, लौटो रथ की तरह,
जीत की तरह, चिरन्तन कविता-सी लौटो ।
गीत बनकर गूंजेंगे, प्रेम बनकर,
पवित्र सुर की तरह फैल जायेंगे हम
धरती-आकाश तक ।

 ४. जल  जाने  दो


 तो फिर जल जाने दो जलस्तम्भ,
भग्न आहत हृदय ।
दूर हो सारी शांति, सारी तृप्ति,
विस्मृत हो सर्वस्व,
सिर्फ तुम्हारे दर्द से भरा रहे, हृदय ।
नौकाकार तुम्हारी आंखों में थी
एक गहरी पुकार समुद्र की,
थे बादल, छांव, हवा, तूफान और आसमान ।
कांटों की चुभन-सी स्मृतियों वाले
फूलों जैसी, बेइन्तहा तुम्हारी यादें ।
पहले मिलन में छिली त्वचा की
जलन सी गोपनीय, मधुर यह वेदना ।
तो फिर, यह भी हो,
 कि जले जलस्तम्भ, भग्न आहत हृदय ।


 ५. बहुत  दिन बीते 
 

बहुत दिन बीते, कि जब से
छोड़ कर तुम जा चुकी हो,
लौट भी आओ दोबारा
तैरती बहती प्लवन-सी ।
जी रहा मैं इन दिनों
शुष्क शिरीष फल सा
सरस हरे पत्तों में छिपकर ।
नजर तुम आईं, कदाचित,
मानुषी बनकर, कभी जब
देखता मैं सामने दीवार पर
तुमको उभरते, विश्रृंखल
रेखाओं के बीच से ।
पोसे हुए कबूतरों की चाल की तरह,
 उनकी उड़ान , और उनकी
गुटरगूं की तरह, तुम्हें भी
प्यार करता हूं,
और तुम चली जाती हो, फिर-फिर.. ।