Thursday, August 16, 2012

कितना बड़ा है स्त्री की देह का भू-गोल


कितना बड़ा है
स्त्री की देह का भू-गोल
क्या इतनी बड़ी
है स्त्री की देह कि
जिसपर पैदल यात्रा शुरु करे
अलसुबह कोई पवित्र विचार
किसी एक छोर से तो पहुंच ही न पाए
उसके दूसरे छोर तक और शाम हो जाए


कितने पहाड़ हैं
इस भू-भाग पर
कितने पठार
कितनी नदियां
कितने रेगिस्तान


कितनी बारिश होती है यहां
कितने फूल खिलते हैं इस इलाके में


क्या मापा गया
कभी किसी यंत्र से
तापमान इसका
आर्द्रता इसकी


कितनी ऋतुएं
कितनी वनस्पतियां
कितने पशु-पक्षी
पाए जाते हैं यहां


क्या देखा किसी ने
आपदाओं को टूटते
इसकी छाती पर
गिने गए क्या
किसी युग में
क्षत के निशान
इसकी देह पर


कवि-गण रहे रीझते
पृथ्वी के ऊंचाइयों वाले उभारों पर
गहराइयों में रहे तैरते डूबते
अलक्षित रहा कवि की आंख से
समतल इस भू-भाग का जहां
नदियां जुटाती रहीं मिट्टी युगों से चुपचाप
यह क्षेत्र किसी स्त्री की पीठ सा दिखता है


हे पुरातत्ववेत्ताओं !
क्या किसी खुदाई में मिले
आंसुओं के मोती फॉसिल बने हुए


हे वनस्पति-शस्त्रियों !
बताओ क्या किसी जंगल में मिला
कोई फूल कभी न मुरझाने वाला


हे काव्य-रसिकों !
बताओ क्या पढ़ी है कहीं
कविता कोई स्त्री के पेट पर


हे कविता के व्यापारियों !
बताओ लिखी क्यों नहीं गई कोई महान कविता
अब तक उसकी एड़ियों की फटी बिवाइयों पर
क्यों नहीं है कोई याद रखने लायक कविता
हमारी भाषा में उसकी हथेलियों पर उग आए
काले कठोर घट्ठों पर ।

Sunday, June 3, 2012

समकालीनता के बारे में..



कैसे हो कवि
कविता-फ़विता तो खैर
कर लेते हो ठीक ठाक



छप-छपा जाते हो इधर-उधर
अदीब कोई, गाहे बगाहे, लिख भी देता है
तुम्हारी तारीफ़ में , तो क्या इतने से
बचा रहेगा रसूख शाइरी का ?


कभी फ़ोन-फ़ान भी कर लिया करो अमुक सिंह को
तमुक त्रिपाठी से जारी रखो खतो-किताबत
फ़लाँ श्रीवास्तव के शहर भी चले जाया करो
कभी घूमते-घामते , ढेकाँ पाण्डेय जी का जन्म दिन
भी रखा करो याद , अदब के मुख्तलिफ़ रिसालों में
इन सबकी है बड़ी साख , सुनते हैं ।
 

कवि , बड़ी कायर किस्म की है
तुम्हारी सोच समकालीनता के बारे में
बहादुर तुम्हारे समकालीन कैसे खुजला रहे हैं
एक दूसरे की पीठ , देखो , सभ्यता की उस
दीवार के पीछे , बौने भी यहाँ छू लेते हैं आकाश
 

विकल्प दो ही हैं, कवि, दो ही नुस्खे होते हैं
मुश्किल हालात में  
सफ़ल होने के -


किसी की पीठ पर चढ़ कर
छूना होता है आकाश ,
या फ़िर , आत्मनिर्वासन में जीते हुए
होना होता है "उदै परकाश"

 

Saturday, February 4, 2012

ओ मेरी शापित कविताओं



बदचलन हो गये हैं शब्द
बदल दिये हैं सुलूक उन्होंने
कविता में


अब लिखता हूँ प्रेम तो
नहीं खिलता है कोई एक फूल
बस एक गागर रीती सी
डूबती जाती है
हृदय की गहराइयों से
डुब डुब डुबुक डुबुक
की आवाज़ें आती हैं


घृणा लिखते ही कागज पर
नहीं छिटकती हैं लुत्तियाँ
दुख लिखने पर नम नहीं होता
कठिन करेज कोई पहले जैसा


सियाही आँसुओं की हो या
रोशनाई हो लहू सी
इबारतें अब नहीं खिलती हैं
अँधेरे में जुगनुओं की तरह


इन शब्दों का क्या करूँ मैं
जो मेरे आस पास पसरे रहते हैं
सहवास के बाद की निर्लिप्तता में
निस्पन्द ठण्डे जिस्म हों जैसे


आखिर कब टूटेगा कविता का तिलिस्म
आखिर कब लिखी जायेगी वह कविता
जिसके शब्द बोलते होंगे
कि जैसे पान खाये होठों से
बोलती है सुर्ख़ी


ओ मेरी शापित कविताओं
तुम्हारी मुक्ति के लिये , लो
बुदबुदा रहा हूँ वह मन्त्र
जिसे अपने अन्तिम हथियार
की तरह बचा रखा था मैंने


तुम्हें ही वरण करने थे
मेरे कवच और कुण्डल
मुझे काम आना था इसी तरह
कुछ शब्दों को अर्थ सौंपते हुए !


(नील कमल)

अरूप घोष की पेंटिंग - गूगल के सौजन्य से

Saturday, January 28, 2012

‘किट्टू’ के लिए



सपनों की उम्र
लंबी हो गई
ज़िन्दगी छोटी होने का ग़म नहीं

सपनों का अंकुर फूटा है
रोशनी की फ़सल आँखों में
तैरने लगी है

इस रोशनी का नाम किट्टूहोना चाहिए ।



{"हाथ सुंदर लगते हैं" कविता संग्रह में संकलित , बेटे ऋत्विज (किट्टू) के लिए लिखी कविता}

Monday, December 12, 2011

इन्द्राणी हालदार तुम्हारी हँसी..

तेरह तो मैं गिन सकता हूँ
इनमें से आठ दस बहुत साफ़ साफ़
और कुछ आधे पौने लुके छिपे लेकिन
सब के सब तराशे हुए चमकदार सुन्दर
इन्द्राणी हालदार ये तुम्हारे दाँत हैं या कुछ और?

मैं जानना चाहता हूँ 
भला  कैसे कोई चेहरा इतना संजीदा रहता है?
जबकि दो कानों के बीच फैली हो दूधिया उजास
यह बात हमारी समझ में नहीं आती इन्द्राणी हालदार।

अलग है तुम्हारी हँसी
मोनालिसा और माधुरी दीक्षित से 
एक ने दबा रखी है हँसी न जाने किस डर से
दूसरी के चेहरे से फूटती है हँसी फुलझरी सी 
और एक तुम हो कि जैसे हँसी का अर्थशास्त्र 
क्या कोई अवसाद भूले से भी तुम्हें नहीं घेरता ?

मैं तो जब भी हँसता हूँ ठठा कर
तो बिगाड़ ही लेता हूँ अपना चेहरा 
आँखों की कोर पर उभर आती हैं झुर्रियाँ 
मेरे पिता भी तो ऐसे ही हँसते थे जब बहुत खुश होते
सच तो यह कि हमारी आँखें ही मुँद जाती हैं खुशी में
तुम्हारी जैसी नपी तुली हँसी कैसे हँसते हैं इन्द्राणी हालदार?
तुम्हें इस तरह हँसने के कितने पैसे मिलते हैं इन्द्राणी हालदार?

जिनके राजकुमार उनसे रूठ कर चले गए 
जिन्हें प्रेम में छल के अलावा हासिल न हो सका कुछ 
ऐसी राजकुमारियों को हँसी का पता चाहिए इन्द्राणी हालदार
उन्हें इन्तज़ार रहता है घोड़े पर सवार अपने उस राजकुमार का
उनके सपनों में सुनाई पड़ती हैं घोड़ों के हिनहिनाने की आवाज़ें
क्या दुख में भी तुम्हें कभी रुलाई नहीं आती है इन्द्राणी हालदार?

- नील कमल 

Friday, December 2, 2011

कवि शंख घोष की कविताएँ

कवि शंख घोष की कविताएँ
(मूल बांग्ला से अनुवाद - नील कमल)


१. यौवन


दिन और रात के बीच
परछाइयाँ चिड़ियों के उड़ान की
याद आती हैं यूँ भी
हमारी आखिरी मुलाकातें ।


२. तुम


उड़ता हूँ और भटकता हूँ
दिन भर पथ में ही सुलगता हूँ
पर अच्छा नहीं लगता है जब तक
लौट कर देख न लूँ कि तुम हो , तुम ।


३. अखबार


रोज सुबह के अखबार में
एक शब्द बर्बरता
अपने सनातन अभिधा का
नित नया विस्तार ढूँढता है ।


४. सपना


ओ पृथ्वी
अब भी क्यों नहीं टूटती है मेरी नींद


सपनों के भीतर ऊँचे पहाड़ों की तहों से
झरती हैं पंखुरियाँ


झरती हैं पंखुरियाँ पहाड़ों से
और इसी बीच जाग उठते हैं धान के खेत


जब लक्ष्मी घर आयेगी
घर आयेगी जब लक्ष्मी


वे आयेंगे अपनी बन्दूकें और
कृपाण लिए हाथों में , ओ पृथ्वी


अब भी क्यों नहीं टूटती है मेरी नींद ।


५. नीग्रो दोस्त के नाम एक ख़त


रिचर्ड रिचर्ड
रिचर्ड तुम्हारा नाम मेरे लफ़्ज़ों में है ।
कौन रिचर्ड ?
कोई नहीं ।
रिचर्ड मेरा लफ़्ज़ नहीं है ।


रिचर्ड रिचर्ड
रिचर्ड तुम्हारा नाम मेरे सपनों में है ।
कौन रिचर्ड ?
कोई नहीं ।
रिचर्ड मेरा सपना नहीं है ।


रिचर्ड रिचर्ड
रिचर्ड तुम्हारा नाम मेरे दुख में है ।
कौन रिचर्ड ?
कोई नहीं ।
रिचर्ड मेरा दुख नहीं है ।
 
 


 

Thursday, October 20, 2011

सचिन तेन्दुलकर, मदर टेरेसा, मोहनदास व अन्य

एक कविता लिखना चाहता हूँ ..



एक शब्द को स्टेडियम के बाहर
उछाल देना चाहता हूँ
पूरी ताक़त बटोर कर ,

 बिलकुल गोल और चमकदार
एक शब्द पर साध कर निगाह
प्रहार करना चाहता हूँ इस तरह
कि कोई चालाक आदमी उसे
बीच में लपक न सके


आज कविता में
सचिन तेन्दुलकर लिखना चाहता हूँ ।





एक शब्द को उठा कर
पार्क-स्ट्रीट , चौरंगी के फ़ुटपाथों से
"निर्मल हृदय" तक ले जाना चाहता हूँ ,

 पवित्र मन से सहलाते हुए
एक घायल अपाहिज शब्द को
साफ़ कर देना चाहता हूँ
उसकी देह से रिसती मवाद
और भिनभिनाती मक्खियाँ


आज कविता में
मदर टेरेसा लिखना चाहता हूँ ।




एक शब्द के साथ
हिंसक हुए बिना
परख लेना चाहता हूँ अपना सुलूक ,

 एक भाषा के एकान्त में
पूरी रात सोना चाहता हूँ
कुछ जवान गर्म शब्दों के साथ
दोहराना चाहता हूँ "सत्य" के साथ मेरे "प्रयोग"

 आज कविता में
मोहनदास कर्मचन्द लिखना चाहता हूँ ।


और भी बहुत-बहुत सी बातें
चाहता हूँ कविता में करना , एक नहीं
दो नहीं
तीन नहीं
चारों पुरुषार्थ चाहता हूँ
सम्भव देखना - शब्दों में , कविता में ।